परमेश्वर राजपूत गरियाबंद : अमेरिका–भारत प्रस्तावित व्यापार समझौते को किसान विरोधी बताते हुए संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) छत्तीसगढ़ ने बड़ा आंदोलन खड़ा करने के संकेत दिए हैं। कलेक्ट्रेट गार्डन रायपुर में आयोजित आवश्यक बैठक में विभिन्न किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए। बैठक में निर्णय लिया गया कि 27 फरवरी को राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मुलाकात कर किसानों की चिंताओं से अवगत कराया जाएगा, वहीं 9 मार्च से ग्राम स्तर पर व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। अप्रैल माह में राज्य स्तरीय कन्वेंशन आयोजित करने की भी घोषणा की गई है। बैठक में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत), जिला किसान संघ बालोद, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, अखिल भारतीय क्रांतिकारी किसान सभा, आदिवासी भारत महासभा, छत्तीसगढ़ किसान यूनियन, किसान मजदूर संघ बिलासपुर, किसान मजदूर महासंघ, नदीघाटी मोर्चा, कृषक बिरादरी, स्पार्क, प्रगतिशील किसान संघ सहित कई संगठनों के पदाधिकारी मौजूद रहे। गरियाबंद, धमतरी, बालोद, रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और बलौदाबाजार जिलों से किसान नेतृत्व व सदस्य शामिल हुए।
बैठक की जानकारी देते हुए संयुक्त किसान मोर्चा छत्तीसगढ़ के संयोजक सदस्य एवं भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश महासचिव तेजराम विद्रोही ने कहा कि प्रस्तावित अमेरिका–भारत व्यापार समझौता केवल व्यापारिक मसला नहीं, बल्कि देश की कृषि व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। उनका आरोप है कि इस समझौते में किसानों की सहमति और सुरक्षा को दरकिनार किया गया है।
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सस्ती विदेशी उपज से संकट की आशंका
किसान नेताओं ने कहा कि अमेरिका की कृषि भारी सब्सिडी, मशीनीकरण और कॉर्पोरेट फार्म मॉडल पर आधारित है। यदि भारत सोयाबीन, मक्का, गेहूं, डेयरी उत्पाद और दालों पर आयात शुल्क कम करता है तो सस्ती अमेरिकी उपज भारतीय बाजार में आएगी। ऐसे में पहले से एमएसपी की लड़ाई लड़ रहे भारतीय किसान असमान प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे।
डेयरी सेक्टर पर ‘सीधा हमला’
मोर्चा ने आरोप लगाया कि भारत का डेयरी मॉडल छोटे और सीमांत किसानों तथा सहकारी व्यवस्था पर आधारित है। यदि अमेरिकी डेयरी उत्पादों को आसान प्रवेश मिला तो लाखों दुग्ध उत्पादक परिवार प्रभावित होंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
एमएसपी व खाद्य सुरक्षा पर खतरा
बैठक में आशंका जताई गई कि व्यापार संतुलन के नाम पर कृषि सब्सिडी में कटौती और सार्वजनिक खरीद प्रणाली को कमजोर करने का दबाव बढ़ सकता है। इससे एमएसपी व्यवस्था, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य आत्मनिर्भरता पर आघात होगा।
बीज पर कॉर्पोरेट नियंत्रण का डर
किसान संगठनों ने कहा कि पेटेंट आधारित बीज और बौद्धिक संपदा अधिकारों के जरिये बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नियंत्रण बढ़ने से भारतीय किसान अपनी पारंपरिक बीज स्वतंत्रता खो सकता है।
छत्तीसगढ़ से जुड़े प्रमुख मांगें
बैठक में राज्य के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। किसान नेताओं ने मांग की कि केंद्र द्वारा घोषित बढ़ी हुई न्यूनतम समर्थन मूल्य के अनुरूप धान पर 3286 रुपये प्रति क्विंटल की दर से अंतर की राशि किसानों को मिले। पूर्व सरकार की एक किस्त का बकाया भुगतान तत्काल किया जाए तथा एमएसपी को सी-2+50 प्रतिशत फार्मूले के साथ कानूनी गारंटी दी जाए।
इसके अलावा रसोईया संघ, बीएड-डीएड संघ, विकलांग संघ और लिंगाडीह बचाओ, तमनार रायगढ़ व हसदेव जैसे जनआंदोलनों की सुनवाई कर शीघ्र समाधान निकालने की मांग भी उठाई गई। किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार आंदोलनों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के बजाय उन्हें टकराव की ओर धकेल रही है।
आगामी कार्यक्रम
तेजराम विद्रोही ने बताया कि 27 फरवरी को राज्यपाल और मुख्यमंत्री से मुलाकात कर भारत–अमेरिका ट्रेड डील पर किसानों की आपत्तियां रखी जाएंगी और केंद्र सरकार से इस समझौते पर हस्ताक्षर न करने की मांग की जाएगी। 9 मार्च से गांव-गांव अभियान चलाकर किसानों को संभावित प्रभावों के बारे में जागरूक किया जाएगा। अप्रैल में राज्य स्तरीय व्यापक कन्वेंशन आयोजित होगा, जिसमें राष्ट्रीय स्तर के कृषि विशेषज्ञ और संयुक्त किसान मोर्चा के शीर्ष नेता शामिल होंगे। कुल मिलाकर, प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर छत्तीसगढ़ में किसान संगठनों ने मोर्चा खोल दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्रमुख बहस का विषय बन सकता है।
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