नई दिल्ली : बच्चा जब तक छोटा रहता है, माता-पिता उसके लिए किसी सुपरहीरो से कम नहीं होते। वह अपनी हर छोटी-बड़ी बात उनसे शेयर करता है, लेकिन जैसे ही बच्चा 'टीनएज' यानी किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखता है, अचानक घर का माहौल बदलने लगता है।
जो बातें कल तक प्यार भरी और सही लगती थीं, वही बातें आज 'लेक्चर' या 'कड़वी' लगने लगती हैं। माता-पिता सोचते हैं कि "बच्चा हाथ से निकल रहा है", और बच्चा सोचता है कि "ये लोग मुझे कभी नहीं समझेंगे," लेकिन क्या यह सिर्फ जनरेशन गैप की वजह से होता है या इसके पीछे कुछ और भी है? आइए इसे थोड़ा गहराई से समझते हैं।
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अपनी पहचान और आजादी की तलाश
टीनएज वो उम्र होती है जब बच्चा अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहता है। वह खुद को बड़ा समझने लगता है और अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना चाहता है। ऐसे में, जब माता-पिता हर छोटी बात पर रोक-टोक करते हैं- जैसे "वहां मत जाओ", "ये कपड़े मत पहनो", या "इस दोस्त से मत मिलो"- तो बच्चे को लगता है कि उसकी आजादी छीनी जा रही है। यही रोक-टोक उन्हें कड़वी लगने लगती है।
बातचीत का तरीका
माता-पिता हमेशा अपने बच्चों का भला ही चाहते हैं, लेकिन कई बार उनके समझाने का तरीका थोड़ा गलत हो जाता है। वे बच्चों से बात करने के बजाय उन्हें 'उपदेश' या 'आदेश' देने लगते हैं। टीनएजर्स को इस उम्र में एक बॉस की नहीं, बल्कि एक दोस्त की जरूरत होती है। जब उन्हें लगता है कि उन पर हुक्म चलाया जा रहा है, तो वे बगावत पर उतर आते हैं।
'हमारे जमाने में तो...' वाला डायलॉग
यह जनरेशन गैप का सबसे बड़ा कारण है। माता-पिता अक्सर बच्चों की तुलना अपने बचपन से करते हैं और कहते हैं, "हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं होता था।" सच तो यह है कि जमाना अब बहुत बदल चुका है। आज इंटरनेट, सोशल मीडिया और कॉम्पिटिशन का दौर है। जब माता-पिता आज की समस्याओं को अपने पुराने चश्मे से देखने की कोशिश करते हैं, तो बच्चे उनसे दूरी बनाने लगते हैं।
हार्मोन्स भी हैं वजह
टीनएज में बच्चों के शरीर और दिमाग में बहुत तेजी से बदलाव हो रहे होते हैं। हार्मोन्स में होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से उन्हें खुद भी नहीं पता होता कि उनका मूड अचानक क्यों खराब हो रहा है। ऐसे में माता-पिता की कोई छोटी सी सलाह भी उन्हें बहुत बड़ी और चुभने वाली बात लग सकती है।
क्या है इसका समाधान?
इस उलझन का हल बहुत ही सीधा है- खुली बातचीत।
रिश्तों की इस डोर को मजबूत करने के लिए दोनों तरफ से थोड़ा-थोड़ा झुकना जरूरी है। जब माता-पिता दोस्त बन जाएंगे, तो बच्चों को उनकी बातें 'कड़वी' नहीं, बल्कि 'कारगर' लगने लगेंगी।
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