केले की बंपर पैदावार चाहिए तो फरवरी-मार्च में न करें ये चूक

केले की बंपर पैदावार चाहिए तो फरवरी-मार्च में न करें ये चूक

बिहार का कोसी क्षेत्र विशेषकर सहरसा जिला अपनी उपजाऊ मिट्टी और केले की खेती के लिए मशहूर है. यदि आप सहरसा में केले की खेती कर रहे हैं और आपको लगता है कि पौधों में फल आपकी उम्मीद के मुताबिक नहीं आ रहे, तो यह खबर आपके लिए है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फरवरी और मार्च का महीना केले की फसल के लिए टर्निंग पॉइंट साबित होता है. इस समय किया गया सही प्रबंधन न केवल पैदावार बढ़ाता है, बल्कि मिट्टी की सेहत को भी दुरुस्त रखता है.

संतुलित पोषण ही है सफलता की कुंजी
सहरसा स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.पंकज कुमार राय के मुताबिक केले की फसल से भरपूर उत्पादन लेने के लिए संतुलित पोषण प्रबंधन सबसे अनिवार्य शर्त है. केले के पौधों को मुख्य रूप से तीन तत्वों नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. हालांकि इनकी सटीक मात्रा पौधे की उम्र, मिट्टी की उर्वरता और स्थानीय जलवायु पर निर्भर करती है. वैज्ञानिकों ने केले के जीवनचक्र को दो मुख्य चरणों में विभाजित किया है. पहला प्रारंभिक वृद्धि अवस्था. इसमें जब पौधा तेजी से बढ़ रहा होता है. दूसरा फलन अवस्था. जब पौधे में फल आने की प्रक्रिया शुरू होती है.

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खाद और उर्वरक का सही गणित
विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती दौर में प्रति पौधा लगभग 150 ग्राम नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है. इसे एक साथ देने के बजाय समान किस्तों में विभाजित कर अलग-अलग समय पर देना चाहिए. वहीं जब पौधा फलन की अवस्था में हो, तब प्रति पौधा 50 ग्राम नाइट्रोजन तीन खुराकों में देने से फल का आकार और वजन दोनों बढ़ते हैं. केले की खेती में फास्फोरस की जरूरत सीमित होती है, लेकिन पोटाश का महत्व बहुत ज्यादा है. पोटाश न केवल फल की मिठास और गुणवत्ता बढ़ाता है. बल्कि गुच्छों का वजन बढ़ाकर किसानों को अधिक मुनाफा दिलाता है.

फरवरी-मार्च में क्या करें खास?
जैसे ही ठंड का असर कम होता है और फरवरी-मार्च की गर्माहट शुरू होती है. केले के पौधों की वृद्धि की रफ्तार बढ़ जाती है. इस दौरान पौधों की भूख बढ़ जाती है. इसलिए निम्नलिखित कार्य अवश्य करें. जैविक खाद का प्रयोग. प्रत्येक पौधे के पास 10 से 15 किलो अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट डालें. इससे मिट्टी की संरचना सुधरेगी और जड़ें अधिक पोषक तत्व सोख पाएंगी.

यूरिया का संतुलित उपयोग. इस मौसम में प्रति पौधा 50 से 70 ग्राम यूरिया देना अत्यंत लाभकारी है. ध्यान रहे कि यूरिया को तने से थोड़ा दूर गोलाई में डालें और मिट्टी में मिलाकर हल्की सिंचाई कर दें. यूरिया की अधिक मात्रा पौधों को नुकसान पहुंचा सकती है. इसलिए विशेषज्ञ की सलाह का पालन करें. निराई-गुड़ाई और स्वच्छता. खरपतवार (घास-फूस) पौधों के भोजन में हिस्सा बटाते हैं. जिससे फसल कमजोर हो जाती है. फरवरी-मार्च में एक से दो बार निराई-गुड़ाई करने से मिट्टी में हवा का संचार बढ़ता है. पौधों की बढ़वार तेज होती है. सहरसा के किसान यदि इन वैज्ञानिक सुझावों को अपनाते हैं, तो वे न केवल फसल की गुणवत्ता सुधार सकते हैं, बल्कि अपनी आय में भी क्रांतिकारी वृद्धि कर सकते हैं.

 








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