क्या है जंगली पालक और कैसे होती है इसकी खेती? जानें

क्या है जंगली पालक और कैसे होती है इसकी खेती? जानें

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के किसान अब लीक से हटकर खेती करने में रुचि दिखा रहे हैं. जिले की बेहट विधानसभा के अंतर्गत आने वाले गांव खुर्र्मपुर के किसान सतीश कुमार सैनी ने परंपरागत खेती को छोड़कर औषधीय पौधों की खेती शुरू की है, जो आज के समय में अत्यधिक मुनाफे का सौदा साबित हो रही है. खुर्र्मपुर आज सहारनपुर का एक ऐसा गांव बन गया है जहां के किसान ऐसी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिनका सीधा उपयोग आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक दवाइयां बनाने में किया जाता है.

क्या है ‘जंगली पालक’ और कैसे होती है इसकी खेती?
सतीश कुमार सैनी ने अपने 12 बीघा (करीब एक एकड़) खेत में जंगली पालक लगाया है, जिसका वानस्पतिक नाम ‘प्लांटेगो मेजर’ (Plantago Major) है. इस पालक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसका इस्तेमाल सब्जी बनाने में नहीं, बल्कि केवल दवाओं के निर्माण में होता है. सतीश कुमार के अनुसार, इसे किसी भी प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है. इसकी बुवाई अक्टूबर से नवंबर के बीच की जाती है और अप्रैल-मई के महीने तक यह फसल पूरी तरह तैयार होकर कटाई के लिए उपलब्ध हो जाती है. 6 महीने के इस चक्र में यह फसल किसानों की आय को कई गुना बढ़ा देती है.

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खाद और रसायन फ्री खेती से बंपर मुनाफा
इस औषधीय खेती की सबसे खास बात यह है कि इसमें किसी भी प्रकार के हानिकारक खाद या रासायनिक कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं पड़ती है. सतीश कुमार बताते हैं कि एक एकड़ खेत से लगभग 40 से 45 क्विंटल जंगली पालक का उत्पादन मिल जाता है. बाजार में इसकी मांग इतनी अधिक है कि यह 40 रुपये किलो से लेकर 100 रुपये किलो तक आसानी से बिक जाता है. यह अन्य सामान्य पालक या परंपरागत फसलों की तुलना में चार गुना अधिक मुनाफा देने वाली फसल है, जिससे किसानों की आर्थिक स्थिति में बड़ा सुधार देखने को मिल रहा है.

पढ़ाई के दौरान मिली प्रेरणा ने बदला रास्ता
सतीश कुमार ने बताया कि उन्हें औषधीय पौधों की खेती की प्रेरणा अपनी पढ़ाई के दौरान मिली थी. उन्होंने देखा कि परंपरागत खेती (धान, गेहूं, गन्ना) में मेहनत अधिक है लेकिन आय सीमित है. पिछले 8 सालों से वे इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. हालांकि, शुरुआत में उन्हें बाजार तलाशने में थोड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे रास्ते खुलते गए. आज वे न केवल खुद सफल हैं, बल्कि उनके गांव के कई अन्य किसान भी उनसे प्रेरित होकर औषधीय पौधों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं.








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