मुखिया के मुखारी - सरकारी दावें हैं दावों से सरकार का क्या?

मुखिया के मुखारी - सरकारी दावें हैं दावों से सरकार का क्या?

 

सरकार सुशासन के दावें ही नहीं करती उसे रोज प्रचारित भी करती है, फिर तो मूलभूत सुविधाओं स्वास्थ्य ,शिक्षा ,और सुरक्षा पर सरकार की उपलब्धियां बेजोड़ होंगी, क्या पर ऐसा है ? सरकारी योजनाओं पर कारिंदे रोज पलीता लगा रहे, पर दलालों के नोटों की लाली में सरकार है की लाल नही हो रही,अव्यवस्थाएं ढेरों हैं पर सरकारी शेरों ने मौन की चादर ओढ़ रखी है, CGMSC के काले कारनामों के संग खाद्य औषधि प्रशासन विभाग भी कदम ताल कर रहा है, प्रतिनियुक्ति की डोर से भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को साधकर बेनामी संपत्तियां बनाई जा रहीं है ,आम जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर तिजौरियां भरी जा रहीं हैं ,अमानक दवाइयां और उपकरण खपाए जा रहें है जो ईलाज में किसी काम की नही जिन्हें खुद ईलाज की जरूरत है,शशांक के आगे पूरा CGMSC आज भी नतमस्तक है,निजी चिकित्सालयों में सील लगाना भी वसूली करने का नया तरीका बन गया है । स्वास्थ्य लाभ हो न हों तिजौरी लाभ का जरिया बन गया है, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी विभाग और स्वास्थ्य दोनों का स्वास्थ्य ख़राब करने में पूरी शिद्दत से लगे हैं जन औषधि केन्द्रों के हालात भी बद से बत्तर है सस्ती दवाइयों के नाम पर दुकानदार लुट की दूकान चला रहे,एक ही दवाई की कीमत अलग -अलग दुकानों पर अलग -अलग डिस्काउंट पर बेचे जा रहें 75% छुट के दावें झूठें हैं न इस पर कोई कोई नियंत्रण है, न कारिंदे इसकी सुध ले रहें, शुद्ध कमीशन खोरी का खेल चल रहा ,जेनरिक के नाम पर जनरेशन के लिए पैसा कमानें का अभियान चल रहा अभी तक तो नीरों की बंशी बजाने का उद्धरण सुना था यहाँ तो विभाग लुट रहा और मंत्री स्वास्थ्य बंशी बजा रहें, अधिकारी अब ऑफिस में क्या होटलों में सेटलमेंट कर रहे, महिला अधिकारी भी पूरा सशक्त होने का प्रमाण दे रहे,भ्रष्टाचार में पूरी हिस्सेदारी ले रहें,निजी अस्पतालों की ऐश है सरकारी अस्पतालों  में तों सरकार के लोग ही नहीं जाते, नक्सली हमलों के घायल जवानों की चिकित्सा भी राजधानी के निजी अस्पताल में होती है, सरकार के अस्पतालों में संसाधनों की कमी है या प्रतिभाओं की ये तो सरकार भी नहीं जानती है ।

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शिक्षा की भी अजब कहानी है शिक्षक ,शिक्षा सचिव से लेकर शिक्षा मंत्री में से किसी के बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ते पर ये पुरे मनोयोग से छ. ग.  का शिक्षा स्तर सुधार रहें .ये बात लग है की इनके कामों पर इनके घरवालों का भरोसा नहीं पर ये प्रदेश का भरोसा जीतने का रोज दावा कर रहें,निजी स्कूलों के परीक्षा परिणामों के आगे साल दर साल सरकारी स्कुल बौने साबित होतें हैं पर शिक्षक इनके सालभर आंदोलित रहतें हैं, निजी स्कूलों में फ़ीस ज्यादा वेतन कम, सरकारी में वेतन ज्यादा फ़ीस कम ,काम की कमी कहाँ हैं निजी स्कूलों के शिक्षकों की मेहनत पर प्रबंधन डाका डालता है ,सरकारी स्कूलों पर यही डाका अधिकारियों का प्रतिनियुक्तियों का खेल चल रहा शिक्षकों को भी प्रसाशनिक कार्यों का नशा चढ़ रहा ,पढ़ने पढ़ाने से ज्यादा पैसा कमाने का चस्का चल रहा ,मान्यता देने ,बनायें रखने के लिए मान्यवरों को वर चाहिए तभी वरदान मिलेगा, जमीनों की बंदरबांट हो रही है शिक्षा का स्तर सुधरे न सुधरे उनके भ्रष्टाचार का स्तर रोज सुधर रहा है, निजी स्कूलों की फ़ीस देने वालों के आईटीआर का मिलान किया जाय तो कई अपने आय से अधिक अपने बच्चों की फ़ीस जमा कर रहें, चमत्कार पैसों के सारे स्कूलों में हो रहे, सरकार एक बस नहीं चला सकती ,निजी स्कुल कई बस दौड़ा रहे यही अंतर परीक्षा परिणामों का भी है, फिर भी कहतें हैं शिक्षा का स्तर सुधार रहें, उच्च शिक्षा में स्थिति और भयावह है फिर भी बस वाह -वाह और वाह है।

नग्न होने के लिए वस्त्रहीन होना ही जरुरी नहीं है, कभी -कभी  नग्नता वस्त्र फाड़कर भी निकल आती है वर्दी की परिधि में बंधी छ.ग. की पुलिस जो कर रही है उसे सुरक्षा तो नहीं कहतें सिपाही से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों की अपराधों में संलिप्तता क्या पुलिस के मान और सम्मान को आघात नही पहुंचा रही? ऐसा कौन सा अपराध है जिसमे पुलिस की सक्रिय सहभागिता नहीं रही है ?मनोवृत्ति बदल रही है अपराधियों के अपराधों की तुलना में पुलिस वालों के अपराध और सहभागिता अक्षम्य और असहनीय हैं, क्योंकि जनसुरक्षा का दायित्व पुलिस का है ,ऐसे कौन से कारक और कारण हैं जिसकी वजह से छ.ग. पुलिस इतनी नैतिक और चारित्रिक रूप से कमजोर हो गई है? इस मनोवृत्ति से की गई जाँच क्या सही होती होगी ? क्या पुलिस विद्वेष पूर्ण कार्यवाही नही कर रही होगी? यदि सबकुछ सही हो रहा होता तो अभियोजन न्यायालय में केस नहीं हार रहा होता ? सुशासन की ये कैसी व्यवस्था सरकार दावें जों करतीं है उसमें व्यवस्थाओं से ज्यादा अव्यवस्थाएं दिखती है क्योंकि -----------------सरकारी दावें हैं दावों से सरकार का क्या?

चोखेलाल

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मुखिया के मुखारी व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की टिप्पणी








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