तोरई की उन्नत और हाईब्रिड किस्में किसानों के लिए आय का बड़ा जरिया बन रही हैं. ये फसल मात्र 45 दिनों में तैयार हो जाती है और पारंपरिक किस्मों की तुलना में अधिक उत्पादन देती है. कम अवधि और बेहतर पैदावार के कारण किसान एक सीजन में अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं, जो 2 लाख रुपये तक पहुंच सकता है. आधुनिक तकनीक और गुणवत्तापूर्ण बीजों के उपयोग से तोरई की खेती लाभकारी साबित हो रही है और किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही है.
देश में सब्जी खेती की ओर किसानों का रुझान लगातार बढ़ रहा है.कम समय में तैयार होने वाली और बाजार में हमेशा मांग रहने वाली फसलों में तोरई किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसान उन्नत और हाईब्रिड किस्मों का चयन करें तो कम लागत में ज्यादा उत्पादन लेकर अच्छी कमाई कर सकते हैं.
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित पूसा नाडार किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है.यह किस्म 45 से 50 दिन में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर 150 से 180 क्विंटल तक उत्पादन देती है. जल्दी तैयार होने के कारण किसानों को सीजन की शुरुआत में ही बेहतर भाव मिल जाता है.
ये भी पढ़े : मुखिया के मुखारी - कुर्सी के लिए बुद्धि भी चाहिए
इसी तरह अर्क सुजात जिसे भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बेंगलुरु ने विकसित किया है, 180 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार देती है.इसके फल एकसमान और मजबूत होते हैं, जिससे लंबी दूरी तक परिवहन में नुकसान कम होता है.
वाराणसी स्थित कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित काशी दिव्या भी किसानों के लिए लाभकारी मानी जा रही है.यह किस्म ज्यादा फल सेटिंग के लिए जानी जाती है और अनुकूल परिस्थितियों में 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दे सकती है.
हाईब्रिड किस्मों में निर्मल हाइब्रिड 40 से 45 दिन में तैयार हो जाती है और 220 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देने की क्षमता रखती है.बाजार में इसके बड़े और आकर्षक फलों की मांग अधिक रहती है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं.
कृषि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसान फरवरी-मार्च और जून-जुलाई में बुवाई करें. अच्छी जल निकास वाली दोमट मिट्टी में फसल बेहतर होती है. बेल वाली फसल होने के कारण ट्रेलिस सिस्टम (सहारा पद्धति) अपनाने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बढ़ते हैं. संतुलित उर्वरक प्रबंधन और नियमित सिंचाई से फसल स्वस्थ रहती है.
अगर किसान एक एकड़ में आधुनिक तकनीक और उन्नत किस्मों के साथ तोरई की खेती करें तो लागत निकालने के बाद 1.5 से 2 लाख रुपये तक शुद्ध लाभ संभव है. यही कारण है कि अब पारंपरिक फसलों की जगह सब्जी खेती को किसान आय बढ़ाने का मजबूत विकल्प मान रहे हैं.
.jpeg)

Comments