देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में फसल अब अपने अंतिम पड़ाव पर है. किसानों के लिए यह समय बेहद संवेदनशील है, क्योंकि अंतिम सिंचाई का सही निर्णय ही ‘बंपर पैदावार’ और ‘नुकसान’ के बीच का अंतर तय करेगा. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गेहूं की बाली में दाना भरते समय नमी की कमी उपज को 20% तक कम कर सकती है. इस चरण पर सही प्रबंधन न केवल दानों के वजन को बढ़ाता है, बल्कि उनकी चमक और गुणवत्ता में भी सुधार करता है. इस महत्वपूर्ण समय में किसानों को किन सावधानियों के साथ अंतिम पानी देना चाहिए ये जानना बेहद जरूरी है.
प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह ने बताया कि गेहूं की फसल में आखिरी सिंचाई ‘मिल्किंग स्टेज’ के अंतिम चरण में की जानी चाहिए. इस समय दाने के अंदर स्टार्च का जमाव हो रहा होता है. अगर इस दौरान खेत में सूखा पड़ा, तो दाने पिचक सकते हैं और उनका आकार छोटा रह सकता है. विशेषज्ञों की सलाह है कि सिंचाई करते समय मौसम विभाग के पूर्वानुमान पर खास नजर रखें. अगर तेज हवा चलने की संभावना हो, तो सिंचाई रोक देनी चाहिए. गीली मिट्टी में पौधों की जड़ें ढीली हो जाती हैं, जिससे तेज हवा में फसल गिरने का खतरा बढ़ जाता है, जो सीधे मुनाफे पर चोट करता है.
ये भी पढ़े :मुखिया के मुखारी - पैसा सबसे ज्यादा जरुरी है
दुधिया अवस्था का महत्व
गेहूं की फसल में दुधिया अवस्था वह समय है जब बालियों के अंदर दाने नरम होते हैं और दबाने पर दूध जैसा पदार्थ निकलता है. इस दौरान पौधों को सबसे अधिक पोषण और जल की आवश्यकता होती है. यदि मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती है, तो पोषक तत्वों का संचार सुचारू रूप से होता है. इससे दानों का भराव पूरा होता है और वे ठोस व वजनदार बनते हैं, जिससे प्रति एकड़ पैदावार में खास बढ़ोतरी देखी जाती है.
तेज हवा और जलभराव से बचाव
अंतिम सिंचाई के दौरान सबसे बड़ी चुनौती मौसम का मिजाज है. मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत में चलने वाली पछुआ हवाएं सिंचाई के बाद फसल को गिरा सकती हैं. गिरी हुई फसल में दानों का विकास रुक जाता है और कटाई में भी मुश्किल आती है. इसलिए, हमेशा शांत मौसम में या शाम के समय हल्की सिंचाई करें. ध्यान रहे कि खेत में पानी खड़ा न हो, केवल पर्याप्त नमी बनी रहनी चाहिए.
गुणवत्ता और बाजार मूल्य
अंतिम सिंचाई का सीधा संबंध गेहूं की चमक और उसकी बाजार मांग से है. सही समय पर पानी मिलने से दानों की ऊपरी सतह चिकनी और सुनहरी बनती है. ऐसी फसल को मंडी में बेहतर भाव मिलता है. इसके विपरीत, पानी की कमी से दाने झुर्रीदार हो जाते हैं, जिससे उनका वजन गिर जाता है. अतः किसान अंतिम सिंचाई में लापरवाही न बरतें और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर अपनी मेहनत का पूरा फल प्राप्त करें.



Comments