जैन आगमों के अनुसार, काल चक्र के मुख्य दो विभाग हैं। एक उत्सर्पिणी काल और दूसरा अवसर्पिणी काल। इनके भी क्रमशः छह-छह विभाग हैं। दोनों ही काल में क्रमशः धर्म की वृद्धि और हानि होती है।वर्तमान में अवसर्पिणी काल का पंचम आरा चल रहा है, इसमें तीसरे आरे के अंत में जब भोग भूमि समाप्त हो रही थी और कर्म भूमि का आरंभ हो रहा था, तब अंतिम कुलकर नाभिराय और उनकी पत्नी मरुदेवी के यहां प्रथम तीर्थंकर वृषभदेव हुए।
मान्यता है कि उन्हें यह नाम इंद्र द्वारा दिया गया। जैन ग्रंथों में आदिनाथ, ऋषभदेव, पुरुदेव, प्रजापति, आदिब्रह्मा, सनातन आदि एक हजार नामों से इनकी स्तुति की गई है। उनका जन्म चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में नवमी के दिन अयोध्या में हुआ, जो इनकी राजधानी थी। ये जन्म से ही मति, श्रुत तथा अवधि इन तीन ज्ञानों से युक्त थे। जैन मान्यतानुसार, पहले लोग कर्म नहीं करते थे, भोगसामग्री कल्पवृक्षों से मिलती थी।
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कर्मभूमि प्रारंभ होते ही कल्पवृक्षों ने भोगसामग्री देना बंद कर दिया था, जिससे जनता में त्राहित्राहि मच गई। जनता इस समस्या को लेकर राजा नाभिराय के पास पहुंची। राजा ने कहा इसका समाधान अवधिज्ञानी राजकुमार ऋषभदेव करेंगे। राजकुमार ऋषभदेव ने दुखी जनता को देखकर सभी की आजीविका चलाने के लिए षट्कर्म का उपदेश दिया। जो निम्न प्रकार हैं -
1. असि : असि का अर्थ तलवार। जो देश की रक्षा के लिए तलवार लेकर देश की सीमा पर खड़े रहकर देश की रक्षा करते हैं।
2. मसि : मुनीमी करने वाले, लेखा-जोखा रखने वाले, चार्टर्ड एकाउंटेंट एवं बैंक कैशियर आदि।
3. कृषि : जीव हिंसा का ध्यान रखते हुए खेती करना अर्थात अहिंसक खेती एवं पशुपालन करना।
4. विद्या : सभी प्रकार के शैक्षणिक कार्य करना।
5. शिल्प : सोनार, कुम्हार, चित्रकार, कारीगर, दर्जी, नाई, रसोइया, मूर्तिकार, मकान, मंदिर आदि के नक़्शे बनाना अदि।
6. वाणिज्य : सात्विक और अहिंसक व्यापार, उद्योग करना।
इस उपदेश से मानवों में शांति आई और वे कर्ममय जीवन जीने लगे। कुछ समय के पश्चात् राजकुमार ऋषभदेव का विवाह नंदा एवं सुनंदा नामक दो कन्याओं से हुआ। पिता ने राजकुमार ऋषभदेव का राजतिलक कर दिया। राजा ऋषभदेव ने अपनी दोनों पुत्रियों में ब्राह्मी को अक्षर विद्या एवं सुंदरी को अंकविद्या सिखाई।
इनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती हुए, जिन्होंने पृथ्वी के छह खंडों पर एकक्षत्र राज्य किया। ऋषभदेव एवं उनके पुत्र भरत का चरित श्रीमद्भागवत के पंचम स्कंध में वर्णित है और जैन परंपरा में नौवी शती में आचार्य जिनसेन ने इन्हीं के जीवन पर संस्कृत में आदिपुराण की रचना की है।
कृषि करो या ऋषि बनो
ऋषभ देव जी ने चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की नवमी को दीक्षा धारण की और वन में तपस्या की। फिर जीवों को संसार-सागर से पार होने का उपदेश करते हुए पृथ्वी पर विहार किया और ‘कृषि करो या ऋषि बनो’ का सनातन उपदेश दिया। कहते हैं दीक्षा के पश्चात वे छह मास तक निश्चल कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यानस्थ रहे।
मोक्ष प्राप्त कथा
ऋषभदेव जी को फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इसके पश्चात वह कैलाश पर्वत पर ध्यानारूढ़ हुए और अंतिम योग-निरोध कर माघ कृष्ण चतुर्दशी को इन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। वे ही जैन संस्कृति के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव कहलाए।



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