नई दिल्ली : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने दत्तक पुत्र के कानूनी अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। जस्टिस पीपी साहू की बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल रजिस्टर्ड गोदनामा किसी व्यक्ति को कानूनी उत्तराधिकारी नहीं बनाता।कोर्ट ने कहा कि जब तक गोद देने और लेने की अनिवार्य रस्मों को ठोस सबूतों के साथ साबित नहीं किया जाता, तब तक गोद लेने की प्रक्रिया को शून्य माना जाएगा।
रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति का निर्देश
इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायालय, मनेंद्रगढ़ के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें लखीराम यादव को रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति और कानूनी पिता के सभी सेवा लाभों का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।
कोरिया जिले के लखीराम ने रेलवे के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने बताया कि वर्ष 1976 में रेलवे कर्मचारी पिता ने उसे गोद लिया था।
रेलवे में अनुकंपा पर नियुक्ति आवेदन खारिज
उस समय उनकी उम्र लगभग छह वर्ष थी। 22 वर्ष बाद, वर्ष 1998 में इसका विधिवत पंजीकरण कराया गया। पिता की मृत्यु के बाद, उसने रेलवे में अनुकंपा पर नियुक्ति और सेवा लाभों के लिए आवेदन किया, जिसे रेलवे ने खारिज कर दिया।
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इस निर्णय को चुनौती देते हुए उसने जिला एवं सत्र न्यायालय में अपील की, जहां कोर्ट ने उसके पक्ष में फैसला दिया। रेलवे ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी।
गोद लेने की ये है प्रक्रिया
कोर्ट में गवाहों के बयान में भिन्नता पाई गई। एक गवाह ने कहा कि गोद लेने की प्रक्रिया ठंड के मौसम में हुई थी, जबकि दूसरे ने इसे गर्मी के दिनों में बताया। हिंदू दत्तक ग्रहण अधिनियम के अनुसार, बच्चे को गोद देने और लेने की रस्म अनिवार्य है। गवाह यह नहीं बता सके कि गोद लेने की प्रक्रिया कब व कहां हुई।
नियमानुसार, गोद लेने की प्रक्रिया दो चरणों में होती है। पहले चरण में संबंधित को कानूनी रूप से गोद लिया जाता है और दूसरे चरण में गोद लिए व्यक्ति को उत्तराधिकारी घोषित करते हुए संपत्ति देने की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
इसके अलावा, गोद लेने के लिए अधिकतम आयु 15 वर्ष निर्धारित की गई है। इससे अधिक के लड़के या लड़की को गोद नहीं लिया जा सकता।



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