35 रुपये महीने से शुरू हुआ सफर, नाना पाटेकर ने ऐसे पाई बॉलीवुड में पहचान

35 रुपये महीने से शुरू हुआ सफर, नाना पाटेकर ने ऐसे पाई बॉलीवुड में पहचान

मुंबई :  अपनी बेबाकी, संवेदनशीलता और गहन जीवनदृष्टि के लिए जाने जाते हैं अभिनेता नाना पाटेकर। अमेजन एमएक्‍स प्‍लेयर पर हालिया रिलीज प्रकाश झा निर्देशित वेब शो ‘संकल्‍प’ (Sankalp) से ओटीटी पर डेब्यू करने वाले नाना ने इसमें माट साब की भूमिका निभाई है। उसे बात की स्मिता श्रीवास्तव ने...

आपके जीवन के मास्‍टर साहब कौन रहे हैं जिनकी सिखाई बातें अब तक आपके काम आती हैं?

सभी ने मुझे सिखाने की कोशिश की लेकिन वो सब मास्‍टर हार गए। हमको कोई पढ़ा ही नहीं पाए। (लंबी सी मुस्‍कान देते हैं) मैं सच कहता हूं। वजह यह है कि गांव खेड़े में रहे हम। एबीसीडी हमने पांचवीं कक्षा में शुरू किया। जब हम शहर में आए तो बच्‍चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते थे। वो जो कुछ बोलते थे तो हमको लगता था कि हमारा मजाक उड़ा रहे हैं।

हम बोलते थे ‘क्‍या बोल रहा’ तो वो बेचारे डर जाते थे। हमें अच्‍छा लगने लगा, हम डराने लगे। हम छठवीं कक्षा में शहर में आए। हमारी मां ने हमारी मौसी के पास भेजा था। वह स्‍कूल में हेडमिस्‍ट्रेस थी। अगले साल उन्‍होंने वापस भेज दिया कि कहीं उनके बच्‍चे ही बिगड़ न जाएं।

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बचपन में क्‍या शरारतें करते थे?

हम कोई भी काम सीधा करते ही नहीं थे। अगर कोई भी गाना रेडियो पर बजा तो हम बता देते थे कि किसने लिखा, किसने गाया, इतना मशगूल होते थे। हम जहां रहते थे वहां पर अगल-बगल में इतने थिएटर थे कि उसमें ही ताका करते थे।

‘अंकुश’ (Ankush) जब रिलीज हुई थी तो एक अलग पोस्‍टर छपवाया था सह निर्माता और निर्देशक एन चंद्रा ने कि नाना पाटेकर वाचआउट। तब मुझे कोई नहीं जानता था। तो दादर से बांद्रा तक जाकर हर जगह उस पोस्‍टर को देखता रहा। उसके बाद लगा कि सिनेमा के जरिए हम बहुत कुछ कह सकते है। मैं और प्रकाश झा काफी कुछ एक जैसा ही सोचते हैं इसलिए मैं उनके साथ काम करता हूं।

जीवन के अनुभवों ने क्‍या सिखाया?

मैंने 13 साल की उम्र में नौकरी शुरू की थी। आठ किमी जाना और आठ किमी आना, गिनकर 16 किमी चलना होता था। एक वक्‍त का खाना और 35 रुपये महीने की तनख्‍वाह लेकिन जिंदगी का लुत्‍फ लिया। समय और हालात जो सिखाते हैं वो कोई स्‍कूल नहीं सिखा सकता।

सेट पर आप खाना भी बनाते थे। इस बार क्‍या नया बनाया ?

आम तौर पर जो होता है वही बनाया, लेकिन खाने पर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं जाता था। वो (प्रकाश झा) काम में बहुत व्‍यस्‍त रखते थे। डायलॉग को याद करना पड़ता था क्‍योंकि उनकी हिंदी बहुत क्लिष्ट होती है। तो बहुत होमवर्क करना पड़ता था। सच बोलूं तो रीटेक होता है तो अपमान लगता है मुझे। पचास साल हो गए हैं मुझे काम करते हुए। अगर प्रकाश ने ओके बोला तो मैं कहूं कि एक और करते हैं। लेकिन अगर मेरे शब्‍द इधर-उधर हुए तो रीटेक लेना पड़े तो बहुत बुरा लगता है।

आपने फिल्‍म ‘सूबेदार’ में छोटी सी भूमिका भी निभाई...

किरदार की लंबाई मायने नहीं रखती। अनिल कपूर ने कहा कि कर दो। मैंने कर दिया। उन्होंने कहा कि पूछा नहीं क्‍या है। मैंने कहा कि तुमने कहा है तो कर देता हूं। एक मिनट का रोल है!

आपने ‘प्रहार’ के बाद कोई फिल्‍म  निर्देशित नहीं की ?

मुझे कुछ पैसे चाहिए थे। घर बनाना था। निर्देशन में काफी वक्‍त जाता है। अगर फिल्‍म न चले तो फिर वो एक्‍टर भी नहीं रहता, निर्देशक की बात छोड़ दो। वो रिस्‍क मैं नहीं ले पाया। मैं बहुत डरा हुआ था। बहुत गुरबत से जिंदगी गुजारी थी तो मैं पैसे कमाने में लग गया इसलिए निर्देशित नहीं कर पाया। फिर अच्‍छे निर्देशक मिले तो लगा मैं कुछ मिस नहीं कर रहा हूं।









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