कद्दूवर्गीय सब्जियों की बेहतर पैदावार और गुणवत्ता के लिए मचान विधि किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है. इस तकनीक में बेलों को जमीन से ऊपर सहारा देकर उगाया जाता है, जिससे फल साफ, सीधे और आकर्षक बनते हैं. साथ ही रोगों का खतरा कम होने और देखभाल में आसानी के कारण यह खेती अधिक लाभकारी साबित हो रही है.
जब कद्दूवर्गीय सब्जियां जमीन पर फैलती हैं, तो वे मिट्टी और नमी के संपर्क में आकर एक तरफ से पीली या बदरंग हो जाती हैं. मचान पर फल लटकते हुए बढ़ते हैं, जिससे उन्हें चारों तरफ से समान धूप और हवा मिलती है. इसके परिणामस्वरूप फलों का आकार सीधा रहता है, रंग गहरा हरा और आकर्षक होता है, जिससे बाजार में किसानों को बेहतर दाम मिलते हैं.
जिला उद्यान अधिकारी डॉ पुनीत कुमार पाठक ने बताया कि जमीन पर रहने वाली बेलों में फंगस और मिट्टी से पनपने वाले कीटों का हमला अधिक होता है. मचान विधि में पौधे जमीन से ऊपर रहते हैं, जिससे हवा का संचार बना रहता है और नमी की वजह से होने वाला सड़न रोग नहीं लगता है. इससे कीटनाशकों पर होने वाला खर्च कम हो जाता है और फसल लंबे समय तक स्वस्थ बनी रहती है.
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जमीन पर फैली बेलों के बीच चलकर फलों को ढूंढना और तोड़ना काफी कठिन होता है, जिससे बेलें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं. मचान के नीचे खड़े होकर किसान आसानी से फलों की तुड़वाई कर सकते हैं. साथ ही, निराई-गुड़ाई, खाद डालना और सिंचाई करना बहुत सरल हो जाता है, जिससे श्रम की बचत होती है और समय भी कम लगता है.
मचान विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें पौधों की सघनता बढ़ाई जा सकती है. वर्टिकल खेती के कारण कम जगह में अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं. इसके अलावा, परागण (Pollination) की प्रक्रिया भी आसान हो जाती है क्योंकि फूल ऊपर की ओर खुले रहते हैं, जिससे मधुमक्खियां आसानी से उन तक पहुंचती हैं और फल अधिक मात्रा में बनते हैं.
एक मजबूत मचान बनाने के लिए मुख्य रूप से बांस के डंडे, लोहे के तार और प्लास्टिक की सुतली या नेट की जरूरत होती है. खेत के चारों कोनों और बीच-बीच में 10-10 फीट की दूरी पर मजबूत बांस गाड़े जाते हैं. इन बांसों को आपस में जोड़ने के लिए 12 से 14 गेज के लोहे के तारों का जाल बुना जाता है.
सबसे पहले खेत की तैयारी के बाद निश्चित दूरी पर गड्ढे खोदकर बांस गाड़ें. इन्हें जमीन में कम से कम 2 फीट गहरा रखें ताकि तेज हवा में ढांचा गिरे नहीं. ऊपर की तरफ तारों को कसकर बांधें और एक ग्रिड या जाल तैयार करें. जब बेलें 1-2 फीट की हो जाएं, तो उन्हें सुतली की मदद से धीरे-धीरे मचान की ओर चढ़ाना शुरू करें.
मचान तैयार करते समय ध्यान रखें कि तारों में ढीलापन न हो, क्योंकि फलों का वजन बढ़ने पर जाल झुक सकता है. गर्मियों में तेज धूप से बचाव के लिए उचित सिंचाई का प्रबंधन करें. अगर आप बड़े स्तर पर खेती कर रहे हैं, तो 'क्रॉस-वायर' तकनीक का उपयोग करें ताकि पूरे ढांचे को अतिरिक्त मजबूती मिले और फसल चक्र के अंत तक मचान सुरक्षित रहे.



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