रायपुर : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल के अंदर सेप्टिक टैंक की सफाई होनी थी। इसके लिए 10 लोगों के एक ग्रुप ने 7 हजार रुपये में ठीका लिया था। हालांकि इस काम के लिए सेप्टिक टैंक में गए तीन लोगों की मौत हो गई। मृतकों में 26 वर्षीय प्रशांत कुमार, 35 वर्षीय गोविंद सेंद्रे और 32 वर्षीय अनमोल माचखंड शामिल थे। ये सभी नगर पालिका के साथ कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले सफाई कर्मचारी थे।
10 लोगों ने लिया था कॉन्ट्रैक्ट
घटना वाले दिन प्रशांत, 30 वर्षीय सत्यम और सेवक उन 10 लोगों के ग्रुप का हिस्सा थे, जिन्होंने सेप्टिक टैंक की सफाई का काम लिया था। पुलिस के मुताबिक यह टैंक करीब 20 फीट गहरा, 15 फीट लंबा और 10 फीट चौड़ा था। यह तीन फीट तक कचरे से भरा हुआ था। प्रशांत कुमार मूल रूप से ओडिशा के रहने वाले थे और सात भाई-बहनों के परिवार का हिस्सा थे। उनके पिता की मौत के बाद (जो खुद एक सफाई कर्मचारी थे) उनकी मां अपने सात बच्चों के साथ रायपुर आ गईं। वे अब भटागांव इलाके की BSUP कॉलोनी में रहते हैं। सेवक, प्रशांत और सत्यम कभी स्कूल नहीं गए और रायपुर नगर निगम के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर सफाई का काम करते हैं। इनमें से हर कोई अपने कॉन्ट्रैक्टर के ज़रिए महीने के 7500 रुपये कमाता है।
7,500 रुपये थी मंथली कमाई
सेवक ने बताया, “7,500 रुपये के अलावा, हमारा कॉन्ट्रैक्टर हमारे प्रोविडेंट फंड (PF) खाते में करीब 1,000 से 1,500 रुपये जमा करता है। हम सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे तक नगर पालिका के लिए काम करते हैं और उसके बाद हम खुद से काम ढूंढते हैं। ऐसे दिन बहुत कम होते हैं जब हम 400 से 500 रुपये कमा पाते हैं। कई दिन ऐसे भी होते हैं जब हमारे पास कोई काम नहीं होता और कुछ दिन ऐसे भी होते हैं जब हम सिर्फ़ 150 से 200 रुपये ही कमा पाते हैं। जब उनके ठेकेदार ने उन्हें अस्पताल में सेप्टिक टैंक साफ करने का काम दिया, तो उन्हें लगा कि यह जल्दी पैसे कमाने का एक आसान तरीका है। इतने पैसे जितने कमाने में उन्हें आम तौर पर कई दिन लग जाते। इसलिए उन भाइयों ने वह जोखिम उठाने का फ़ैसला किया जिसे दूसरों ने मना कर दिया था। हमने पहले भी सेप्टिक टैंक साफ किए थे, लेकिन उनमें से कोई भी 10 फ़ीट से ज़्यादा गहरा नहीं था।”
‘एक मिनट के अंदर सब खत्म हो गया’
हादसे वाले दिन उनके एक साथी गोविंद सेंद्रे सबसे पहले मैनहोल के रास्ते टैंक के अंदर उतरे। उनके पीछे-पीछे अनमोल माचखंड भी अंदर गए। सेवक ने बताया, “गोविंद सीढ़ी से नीचे उतरे, लेकिन टैंक के अंदर बहुत ज़्यादा ज़हरीली गैस भरी हुई थी, जिसकी वजह से वह नीचे गिर पड़े। अनमोल अंदर गए, लेकिन वह भी नीचे गिर गए। फिर मेरा भाई (प्रशांत) अंदर गया और वह भी नीचे गिर गया। यह सब कुछ बस एक मिनट के अंदर हो गया।” बाकी लोगों को यह एहसास हो गया था कि उनके पीछे-पीछे टैंक के अंदर जाना बहुत ज़्यादा खतरनाक होगा। सेवक ने कहा, “हम बाकी सभी लोग एक-दूसरे को कसकर पकड़े हुए थे। हम रो रहे थे और खुद को टैंक में कूदने से रोक रहे थे।”
प्रशांत कुमार की शादी नहीं हुई थी लेकिन अनमोल माचखंड अपने पीछे अपनी पत्नी और चार महीने के बेटे को छोड़ गए हैं। इसके अलावा अनमोल को सेप्टिक टैंक साफ़ करने का कोई अनुभव नहीं था। वह हाल ही में बेरोज़गार हो गए थे और किसी भी तरह से पैसे कमाने का कोई जरिया ढूंढने के लिए बहुत ज़्यादा बेताब थे। प्रशांत सेप्टिक टैंक के मैनहोल में इसलिए गए, ताकि वह उन दो लोगों को बचा सकें जो उनसे पहले अंदर गए थे।
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पत्नी ने लगाए आरोप
अनमोल की 25 साल की पत्नी अनुपमा ने कहा, “हमारी शादी 2022 में हुई थी और हमारा चार महीने का एक बेटा है। अनमोल ने चार बैंकों से करीब 70,000 रुपये का लोन लिया था। उसने सालों तक गवर्नर हाउस में और फिर नगर पालिका में सफाईकर्मी के तौर पर काम किया, लेकिन हाल ही में वह बेरोजगार हो गया था। उसने किसी को भी इस काम के बारे में नहीं बताया था, जिसकी वजह से उसकी जान चली गई।” पत्नी ने इस बात पर गुस्सा ज़ाहिर किया कि मजदूरों को सही उपकरण नहीं दिए गए थे।
32 वर्षीय शुभम एक ग्रेजुएट हैं और एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हैं। शुभम, अनमोल का बड़ा भाई है। शुभम ने कहा, “मेरे भाई ने स्कूल बीच में ही छोड़ दिया था। आज की दुनिया में हमें जो भी काम मिलता है, हमें वही करने पर मजबूर होना पड़ता है। वह बेबस था।” गोविंद सेंद्रे सबसे पहले मैनहोल में उतरा था। वह सिमरन सिटी के पास स्थित सफाईकर्मी कॉलोनी का रहने वाला था। गोविंद अपने परिवार का अकेला कमाने वाले सदस्य थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी और 14 और 9 साल की दो बेटियां थीं।
गोविंद के रिश्तेदार नागेश सोनी ने पूछा, “वह हमेशा काम की तलाश में रहता था। वह हर महीने करीब 7,000 रुपये कमाता था। आप ही बताइए क्या इतने पैसों से घर चलाया जा सकता है और बच्चों के भविष्य के लिए कुछ बचाया जा सकता है?”
पुलिस ने दर्ज किया मामला
जिन तीनों लोगों की मौत हुई वे सभी अनुसूचित जाति समुदाय से थे। पुलिस ने उनके ठेकेदार किशन सोनी और अस्पताल के मैनेजमेंट के खिलाफ BNS की धारा 106 (1) (लापरवाही से मौत का कारण बनना) और ‘हाथ से मैला ढोने वालों के रोज़गार पर रोक और उनके पुनर्वास अधिनियम’ की धारा 8 (हाथ से मैला ढोने के लिए किसी को काम पर रखने पर सज़ा) और धारा 9 (सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के लिए किसी को काम पर रखने पर सज़ा) के तहत केस दर्ज किया है।
अस्पताल मैनेजमेंट के एक सीनियर सदस्य ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “22 फरवरी को हमने सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन को 6,000 रुपये दिए थे। हम हर 18 महीने में एक बार इसकी सफाई करते हैं। इसमें से बदबू आ रही थी। लेकिन म्युनिसिपैलिटी ने कहा कि वे सिर्फ़ लिक्विड कचरा ही निकाल सकते हैं। पहले भी उन्होंने सिर्फ़ लिक्विड ही निकाला था और बहुत सारा सेमी-सॉलिड कचरा जमा हो गया था। इसलिए हमने यह काम एक प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर को आउटसोर्स कर दिया। यह सिस्टम की नाकामी है। हमें पता नहीं था कि मैला ढोना (manual scavenging) पूरी तरह से बैन है। इस बारे में और ज़्यादा जागरूकता होनी चाहिए।”
ज़ोनल म्युनिसिपल कमिश्नर ने क्या कहा?
ज़ोनल म्युनिसिपल कमिश्नर हितेंद्र यादव ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “यह सच है कि हमें अस्पताल से सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए पांच सेशन के लिए 6,000 रुपये मिले थे। लेकिन हमारी मशीन सॉलिड कचरा नहीं खींच पाई। इसलिए हमने उनसे कहा कि वे कचरे को ढीला करने के लिए उसमें पानी डालें, ताकि हम अपनी मशीनों का इस्तेमाल करके उसे लिक्विड रूप में बाहर निकाल सकें। लेकिन उन्होंने अपने पैसे वापस मांगे और उसके बाद हमारी उनसे कोई बात नहीं हुई।”



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