खंडवा जिले में अब खेती का ट्रेंड बदल रहा है. परंपरागत फसलों के बजाय महिलाएं अब कुछ नया करने की ओर बढ़ रही हैं. इसी कड़ी में गांव की महिलाओं ने एक अनोखी पहल शुरू की है- कस्तूरी भिंडी (मुस्कदाना) की खेती, जिसने अब मिसाल कायम कर दी है. यह खेती महिलाओं ने आजीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़कर शुरू की. कृषि नमामि के मार्गदर्शन में गांव की दीदियों ने इस नई फसल को अपनाया और आज इसके नतीजे उम्मीद से भी बेहतर मिल रहे हैं.
कस्तूरी भिंडी की खेती जून-जुलाई में बोई जाती है और करीब 5 महीने में तैयार होकर जनवरी तक उत्पादन देती है. खास बात यह है कि यह फसल कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली मानी जा रही है. एक एकड़ में करीब 7 से 10 कुंटल तक बीज उत्पादन मिल रहा है और बाजार में इसकी कीमत 25 से 30 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक मिल रही है. ऐसे में महिलाओं की आमदनी में बड़ा उछाल आया है. इस फसल की सबसे बड़ी खासियत इसकी खुशबू है. कस्तूरी भिंडी के बीजों से कस्तूरी जैसी प्राकृतिक सुगंध आती है, जिससे परफ्यूम और इत्र इंडस्ट्री में इसकी डिमांड तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि देश ही नहीं, विदेशों में भी इसकी मांग बनी हुई है और किसानों को अच्छा दाम मिल रहा है.
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परंपरागत खेती का अच्छा विकल्प
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह फसल कपास जैसी परंपरागत खेती का अच्छा विकल्प बन रही है. इसमें रासायनिक खाद की जरूरत बहुत कम होती है, जिससे लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है. सही देखभाल करने पर एक बीघा में करीब 1 लाख रुपए तक का शुद्ध लाभ भी लिया जा सकता है. पंधाना ब्लॉक में इस बार करीब 300 एकड़ में इसकी खेती की जा रही है. महिला किसान कला बामने बताती हैं कि समूह की महिलाओं ने मिलकर इस खेती की शुरुआत की और आज सभी को इसका फायदा मिल रहा है. वहीं जिला पंचायत सीईओ नागार्जुन बी गोड़ा का कहना है कि इस खेती से जुड़ी महिलाएं आने वाले समय में “लखपति दीदी” बन सकती हैं.
कस्तूरी भिंडी की खेती के लिए गर्म जलवायु सबसे उपयुक्त मानी जाती है. 25 से 35 डिग्री तापमान, दोमट मिट्टी और अच्छा जल निकास इसकी अच्छी पैदावार के लिए जरूरी है. बुवाई के समय खेत की अच्छी जुताई कर गोबर की खाद डालना चाहिए. साथ ही जैविक तरीके से कीट नियंत्रण करने पर फसल सुरक्षित रहती है और उत्पादन बेहतर मिलता है.
खंडवा की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि अगर नई सोच और सही मार्गदर्शन मिले, तो खेती में भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है. कस्तूरी भिंडी की खेती अब सिर्फ फसल नहीं, बल्कि गांव की महिलाओं की नई पहचान और आत्मनिर्भरता की कहानी बन चुकी है.



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