बिलासपुर:शहर में संचालित नारायण टेक्नोक्रेट्स स्कूल एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है, जहां शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निगरानी दोनों पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि स्कूल ने पिछले एक वर्ष से CBSE के नाम पर अभिभावकों से मोटी फीस वसूली, जबकि वास्तविक संबद्धता 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी बताई जा रही है। ऐसे में यह प्रश्न लगातार उठ रहा है कि बिना वैध मान्यता के CBSE पाठ्यक्रम कैसे संचालित हुआ और बच्चों को बोर्ड परीक्षा के लिए दूसरे शहरों में क्यों बैठाया गया।
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू डबल रोल नंबर का है। सामने आए तथ्यों के अनुसार कुछ छात्रों का नामांकन बिलासपुर में दर्ज है, जबकि वही छात्र रायपुर में परीक्षा देते नजर आए। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक खामियों की ओर इशारा करती है, बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े करती है। सभी को मालूम है की डीपीआई को ही यू डाइस नंबर देने का अधिकार है बाबजूद इसके बिलासपुर जिला शिक्षा अधिकारी ने छात्रों का यू डाइस नंबर दिया जो कि सरासर गलत है l यूडाइस और नामांकन प्रक्रिया में विसंगतियों के बावजूद जिला शिक्षा विभाग ने अब तक स्पष्ट जवाब नहीं दिया है कि आखिर अलग-अलग स्थानों से रोल नंबर कैसे जारी हुए और इसकी जिम्मेदारी किसकी है।
इस पूरे घटनाक्रम में जिला शिक्षा विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आरोप हैं कि विभाग को यू-डाइस, नामांकन और परीक्षा से जुड़ी विसंगतियों की जानकारी होने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। एक ओर सख्ती के दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर जारी आदेशों और व्यवहार में विरोधाभास नजर आता है। हाल ही में जारी एक आदेश को स्कूल प्रबंधन द्वारा सार्वजनिक कर यह संकेत देने की कोशिश की गई कि संस्था को संबद्धता प्राप्त है, जबकि आदेश में CBSE का स्पष्ट उल्लेख नहीं होने से भ्रम और गहरा हो गया है।
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अभिभावकों का आरोप यह भी है कि शासन द्वारा निर्धारित पुस्तकों की बजाय निजी और महंगी किताबें अनिवार्य की गईं, जिससे उन पर अनावश्यक आर्थिक बोझ पड़ा। कई मामलों में पूरी यूनिफॉर्म किट खरीदने का दबाव बनाया गया, भले ही आवश्यकता आंशिक ही क्यों न हो। यह स्थिति एक नॉन-प्रॉफिट शैक्षणिक संस्था की मूल अवधारणा के विपरीत मानी जा रही है।
मामले में एक और गंभीर पहलू NSPIRA नामक संस्था से जुड़ा सामने आया है, जिसे नारायण एजुकेशन सोसाइटी की सिस्टर कंसर्न बताया जा रहा है। आरोप है कि विद्यालय की यूनिफॉर्म, किताबों और अन्य सामग्रियों की आपूर्ति इसी माध्यम से की जाती है, जबकि इस संस्था का राज्य में स्पष्ट पंजीयन और संरचना संदिग्ध बताई जा रही है। फीस और अन्य भुगतान भी सीधे स्कूल के बजाय बाहर के खातों में जाने की बात सामने आई है, जिससे पूरे वित्तीय लेनदेन की पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
इसके साथ ही कर्मचारियों से जुड़े मुद्दे भी सामने आए हैं। जानकारी के अनुसार कर्मचारियों का PF और ESI छत्तीसगढ़ के बजाय नेल्लौर और मुंबई स्थित खातों में जमा किया जा रहा है। ऐसे में यदि भविष्य में किसी प्रकार का विवाद या दावा उत्पन्न होता है, तो कर्मचारियों को बाहर के राज्यों में भटकना पड़ सकता है। यह व्यवस्था श्रम कानूनों और स्थानीय जवाबदेही के संदर्भ में भी सवाल खड़े करती है।
इसी बीच यह भी जानकारी सामने आ रही है कि नारायण प्रबंधन अब जिला प्रशासन के समक्ष कुछ चयनित अभिभावकों के माध्यम से अपनी स्थिति को सही ठहराने की तैयारी में है। बताया जा रहा है कि इन अभिभावकों की ओर से एक आवेदन प्रस्तुत कर यह संदेश देने की कोशिश की जाएगी कि संस्था पर लगाए जा रहे सभी आरोप निराधार हैं। इसके साथ ही जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी आदेश को संलग्न कर यह स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा कि संस्था वैध रूप से संचालित है, ताकि किसी भी प्रकार की जांच या कार्रवाई को रोका जा सके।
प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय (K-12)
पूरा घटनाक्रम उस पुराने विवाद की याद भी दिलाता है, जब इसी तरह के आरोपों के बीच एक निजी शिक्षा संस्थान पर सवाल उठे थे। अब वही स्थिति एक बार फिर बनती दिख रही है। अभिभावकों के बीच असंतोष लगातार बढ़ रहा है और यह आशंका भी जताई जा रही है कि यदि समय रहते स्थिति स्पष्ट नहीं हुई, तो आने वाले समय में विरोध और घेराव की स्थिति बन सकती है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल एक संस्थान की मनमानी है या फिर सिस्टम की चुप्पी ने इस पूरे मामले को यहां तक पहुंचाया है।



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