आज के दौर में पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) एक ऐसा शब्द बन गया है, जो हर दूसरी-तीसरी महिला की जुबान पर है। पहले यह समस्या 30 साल के बाद देखी जाती थी, लेकिन अब स्कूल जाने वाली टीनएजर्स और 20-25 साल की युवतियों में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह केवल एक हार्मोनल इंबैलेंस नहीं है, बल्कि लाइफस्टाइल से जुड़ी एक गंभीर समस्या भी है। इसलिए इसके खतरे को कम करने के लिए लाइफस्टाइल से जुड़े इन फैक्टर्स के बारे में जानना जरूरी है।
क्यों बढ़ रहे हैं कम उम्र में पीसीओएस के मामले?
खराब खान-पान- आजकल की डाइट में मैदा, चीनी और पैकेट बंद फूड्स की भरमार है। ये चीजें शरीर में इंसुलिन के स्तर को अचानक बढ़ा देती हैं, जो सीधे तौर पर ओवरी के कामकाज को प्रभावित करता है।
सेडेंटरी लाइफस्टाइल- स्क्रीन टाइम बढ़ने और शारीरिक मेहनत कम होने से वजन बढ़ता है। मोटापा पीसीओएस का सबसे बड़ा ट्रिगर है।
तनाव और नींद की कमी- पढ़ाई, करियर का प्रेशर और देर रात तक जागने की आदत शरीर के सर्केडियन रिदम को बिगाड़ देती है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ जाता है।
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खराब खान-पान-पीसीओएस के लक्षण जिन्हें नजरअंदाज न करें
पीरियड्स का अनियमित होना या बहुत कम आना
चेहरे, ठुड्डी या शरीर पर अनचाहे बाल
अचानक वजन बढ़ना, खासकर पेट के निचले हिस्से में
बार-बार मुंहासे और बालों का झड़ना
गर्दन के पीछे या बगल में त्वचा का काला पड़ना आजकल की डाइट में मैदा, चीनी और पैकेट बंद फूड्स की भरमार है। ये चीजें शरीर में इंसुलिन के स्तर को अचानक बढ़ा देती हैं, जो सीधे तौर पर ओवरी के कामकाज को प्रभावित करता है।
सेडेंटरी लाइफस्टाइल- स्क्रीन टाइम बढ़ने और शारीरिक मेहनत कम होने से वजन बढ़ता है। मोटापा पीसीओएस का सबसे बड़ा ट्रिगर है।
तनाव और नींद की कमी- पढ़ाई, करियर का प्रेशर और देर रात तक जागने की आदत शरीर के सर्केडियन रिदम को बिगाड़ देती है, जिससे हार्मोनल बैलेंस बिगड़ जाता है।
पीसीओएस का खतरा कम करने के लिए क्या करें?



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