होर्मुज के बाद बाब-अल-मंडेब पर संकट, वैश्विक व्यापार पर मंडराया खतरा

होर्मुज के बाद बाब-अल-मंडेब पर संकट, वैश्विक व्यापार पर मंडराया खतरा

 नई दिल्ली: विश्व भर में तेल और प्राकृतिक गैस को लेकर मच रहे हाहाकार के बीच एक नया चोक प्वाइंट खतरे की आहट दे रहा है। यह चोक प्वाइंट लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) है।

जो कि अब एक दूसरे मोर्चे के रूप में उभर रहा है। विशेषज्ञ इसे आधुनिक इतिहास में वैश्विक ऊर्जा बाजारों में सबसे गंभीर रुकावट बता रहे हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजारों का ध्यान पिछले 4 हफ्तों से एक ही समुद्री मार्ग पर टिका हुआ है।

ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने बढ़ाया खतरा

वह है होर्मुज जलडमरूमध्य, लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच संघर्ष गहराता जा रहा है। वैसे-वैसे सभी का ध्यान दक्षिण की ओर मौजूद पानी के दूसरे संकरे रास्ते लाल सागर में स्थित बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य की ओर मुड़ रहा है। जब से यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोही इस युद्ध में शामिल हुए है। तब से खतरा और बढ़ गया है।

मौजूदा हालात में बाब अल-मंडेब और भी ज्यादा महत्वपूर्ण

GMS (जहाजों की दुनिया की सबसे बड़ी नकद खरीदार कंपनी) में बिजनेस डेवलपमेंट के उपाध्यक्ष नईम नूर ने कहा, "मौजूदा हालात में बाब अल-मंडेब और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जैसे ही होर्मुज पर दबाव बढ़ता है, ध्यान तुरंत अगले बड़े 'चोक प्वाइंट' (रुकावट वाले बिंदु) की ओर चला जाता है। जो ऊर्जा प्रवाह और वैश्विक व्यापार दोनों को बाधित कर सकता है।

बाब अल-मंडेब व्यापार से जुड़ी रुकावट का व्यापक केंद्र

होर्मुज तेल से जुड़ी रुकावट का बड़ा केंद्र है, लेकिन बाब अल-मंडेब व्यापार से जुड़ी रुकावट का व्यापक केंद्र है। लाल सागर और स्वेज नहर के दक्षिणी प्रवेश द्वार के रूप में, यहां पैदा होने वाला कोई भी गंभीर खतरा न केवल तेल टैंकरों को प्रभावित करता है, बल्कि कंटेनर सेवाओं, ब्रेकबल्क (खुले माल), सूखे माल की आवाजाही, जहाजों की उपलब्धता, बीमा, युद्ध जोखिम प्रीमियम और एशिया-यूरोप मार्ग पर यात्रा की समग्र आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करता है।

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खतरे में एक और 'चोक प्वाइंट'

बाब अल-मंडेब जिसका अरबी में अर्थ है "आंसुओं का द्वार" लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। लगभग 100 किलोमीटर लंबा और 30 किलोमीटर चौड़ा यह जलडमरूमध्य, अरब प्रायद्वीप पर स्थित यमन को 'हॉर्न ऑफ़ अफ्रीका' में स्थित जिबूती और इरिट्रिया से अलग करता है। इसी मार्ग से होकर वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा गुज़रता है।

एशिया और यूरोप के बीच यात्रा करने वाले जहाजों को स्वेज नहर तक पहुंचने के लिए इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरना पड़ता है, जिससे यह दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक बन गया है।

वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस की खेप का लगभग 10 से 12 प्रतिशत हिस्सा बाब अल-मंडेब से होकर गुजरता है। दुनिया के कुल व्यापार का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा इस जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जबकि दुनिया के समुद्री व्यापार का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा स्वेज नहर से होकर गुजरता है।

केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाना पड़ेगा महंगा

अभी के हालात इसलिए भी ज्यादा गंभीर हैं, क्योंकि बाजार ने पहले ही देख लिया है कि जब किसी रास्ते पर भरोसा कमजोर पड़ता है, तो शिपिंग के तरीके कितनी तेजी से बदलते हैं। इसके लिए रास्ते का औपचारिक रूप से बंद होना भी जरूरी नहीं है। मिसाइल या ड्रोन से लगातार मिलने वाले खतरों की वजह से ही जहाजों को 'केप ऑफ गुड होप' के रास्ते से घूमकर जाने पर मजबूर होना पड़ सकता है।

एक बार ऐसा हो जाने पर, यात्रा में लगने वाला समय बढ़ जाता है। ईंधन की लागत बढ़ जाती है, आने-जाने की यात्राएं लंबी हो जाती हैं। माल ढुलाई की दरों पर दबाव पड़ने लगता है। इस लिहाज से, होर्मुज़ के बाद अब 'बाब अल-मंडेब' दूसरा सबसे अहम दबाव वाला बिंदु बन गया है।

अगर ये दोनों रास्ते एक ही समय पर प्रभावित होते हैं, तो इसका असर सिर्फ तेल तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह समुद्री व्यापार में बड़े पैमाने पर रुकावट पैदा करने वाला एक गंभीर मुद्दा बन जाएगा। आने वाले दिनों में अगर यह जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) बंद होता है या इसमें कोई बड़ी रुकावट आती है, तो उद्योग के जानकारों का कहना है कि तेल की कीमतें बढ़कर $150 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

भारत पर भी पड़ेगा असर

भारत के लिए भी बाब अल-मंडेब व्यापारिक और रणनीतिक, दोनों ही लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। इस मार्ग के बंद होने से भारत के ऊर्जा आयात पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। स्वेज नहर से गुजरने वाले तेल और गैस के जहाजों को केप ऑफ गुड होप के रास्ते मोड़ना पड़ेगा। इससे जहाजों को ज्यादा दूरी तय करनी पड़ेगी, जिससे परिवहन लागत बढ़ जाएगी और रूसी कच्चे तेल के आने में कम से कम एक महीने की देरी होगी।

इससे भारतीय उद्योगों के लिए ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स की लागत सीधे तौर पर बढ़ जाएगी। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट की वजह से उत्पादन पर असर पड़ेगा। महंगाई का दबाव भी बढ़ेगा। इसके साथ ही पश्चिम की ओर जाने वाले प्रमुख बाजारों में भारतीय व्यापार की प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ जाएगी।









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