पिता के जीवित रहते भूलकर भी न करें ये 5 काम, गरुड़ पुराण में दी गई चेतावनी

पिता के जीवित रहते भूलकर भी न करें ये 5 काम, गरुड़ पुराण में दी गई चेतावनी

हिंदू धर्म और हमारे प्राचीन शास्त्रों में पिता का स्थान बहुत ऊंचा माना गया है। 'गरुड़ पुराण' जैसे ग्रंथों में तो यहां तक कहा गया है कि जब तक पिता जीवित हैं, वे ही आपके लिए साक्षात देवता हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर तरक्की की सीढ़ी चढ़ते हुए यह भूल जाते हैं कि हमारी जड़ें हमारे पिता ही हैं।

गरुड़ पुराण और धर्मग्रंथों के अनुसार, कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें एक पुत्र को तब तक नहीं करना चाहिए जब तक उसके पिता का आशीर्वाद उसके सिर पर है। आइए जानते हैं वो 5 बातें जो हमें मर्यादा में रहना सिखाती हैं:

1. पिता के रहते न बनें घर के मुखिया

अक्सर देखा जाता है कि बेटा जब कमाने लगता है, तो वह घर के फैसले खुद लेने लगता है। लेकिन, संस्कार यह कहते हैं कि जब तक पिता जीवित हैं, घर के 'मुखिया' का पद उन्हीं का रहना चाहिए। भले ही आप घर का सारा खर्च उठा रहे हों, लेकिन महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी राय और उनकी प्रधानता बनी रहनी चाहिए। यह उनके आत्मसम्मान के लिए बहुत जरूरी है।

2. पितृकर्म खुद से नहीं करना

गरुड़ पुराण में स्पष्ट निर्देश है कि जिसके पिता जीवित हैं, उस पुत्र को मुख्य रूप से तर्पण, पिंडदान या श्राद्ध जैसे 'पितृकर्म' नहीं करने चाहिए। पिता ही वह कड़ी हैं जो अपने पूर्वजों को जल और अन्न देने के अधिकारी हैं। उनके रहते पुत्र द्वारा किया गया ऐसा कार्य शास्त्र सम्मत नहीं माना जाता, जब तक कि पिता स्वयं ऐसा करने की आज्ञा न दें।
ये भी पढ़े :मुखिया के मुखारी - पैसा सबसे ज्यादा जरुरी है

3. दान में पिता का नाम प्राथमिक रखना

जब भी आप किसी मंदिर में या जरूरतमंद को दान देते हैं, तो 'संकल्प' में पिता का नाम आगे रखें। शास्त्रों के अनुसार, पिता के नाम से किया गया दान पुत्र के कुल को सात पीढ़ियों तक लाभ पहुंचाता है।

4. सामाजिक आयोजनों में नाम का क्रम

शादी-ब्याह या किसी भी सामाजिक उत्सव के निमंत्रण पत्र (Invitation Cards) पर अपना नाम पिता से ऊपर या पहले न लिखवाएं। यह केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि शिष्टाचार है। समाज में पिता की पहचान से ही पुत्र की पहचान होनी चाहिए, न कि इसका उल्टा।

5. पारंपरिक प्रतीकों में बदलाव न करना

हमारे घरों में पूजा करने का तरीका, कुल-देवता की परंपरा या घर के कुछ खास प्रतीक होते हैं जो पुरखों से चले आ रहे हैं। पिता के जीवित रहते पुत्र को इन पारंपरिक ढांचों या धार्मिक प्रतीकों में अपनी मर्जी से फेरबदल नहीं करना चाहिए। यह उनकी विरासत का अपमान माना जाता है।

इन मर्यादाओं का आधार गरुड़ पुराण (प्रेत कल्प), मनुस्मृति और धर्मसिंधु जैसे ग्रंथ हैं। जहां पितृ-भक्ति और परिवार के संचालन के नियमों का विस्तार से वर्णन मिलता है।









You can share this post!


Click the button below to join us / हमसे जुड़ने के लिए नीचें दिए लिंक को क्लीक करे


Related News



Comments

  • No Comments...

Leave Comments