खाने से पहले पढ़ें ये लेबल! जानिए कैसे FOPL से बच सकते हैं डायबिटीज और मोटापा

खाने से पहले पढ़ें ये लेबल! जानिए कैसे FOPL से बच सकते हैं डायबिटीज और मोटापा

भारत इस समय एक गंभीर स्वास्थ्य संकट के मुहाने पर खड़ा है। जहां एक ओर हम आर्थिक प्रगति कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर डायबिटीज और मोटापे जैसी लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां महामारी का रूप ले रही हैं।

लांसेट के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज के साथ जी रहे हैं और मोटापे की दर पिछले 15 वर्षों में दोगुनी हो गई है। ऐसे में फास्ट फूड्स और अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स पर फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग (FOPL) एक अच्छी पहल नजर आ रही है। बीमारियों के बढ़ते आंकड़े देखते हुए यह एक जरूरत बन गई है।

हालांकि, इसे लेकर फूड इंडस्ट्री और हेल्थ एक्सपर्ट्स के बीच बहस छिड़ गई है। फूड कंपनियों का कहना है कि यह मॉडल भारत में काम नहीं करेगा। ऐसे में आइए समझते हैं फूड लेबलिंग क्यों जरूरी है, कैसे आप सही तरीके से लेबल पढ़ सकते हैं और बीमारियों से बचाव में यह कैसे मददगार साबित हो सकता है। 

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लेबलिंग क्यों जरूरी है?

फिलहाल ज्यादातर फूड आइटम्स के पीछे बारीक अक्षरों में पोषण से जुड़ी जानकारी दी होती है। एक सामान्य ग्राहक के लिए कार्बोहाइड्रेट, सैचुरेटेड फैट या सोडियम की मात्रा को समझना और उसका हिसाब करना नामुमकिन होता है। ऐसे में लेबलिंग के जरिए उपभोक्ता यह समझ सकता है कि वह असल में खा क्या रहा है और कितनी मात्रा में खा रहा है। 

फूड आइटम में छिपी हुई चीनी और सोडियम की ज्यादा मात्रा के खतरों के बारे में भी लेबलिंग के जरिए उपभोक्ता सचेत हो सकता है। साथ ही, यह फूड कंपनियों को अपने प्रोडक्ट को ज्यादा हेल्दी बनाने और स्वास्थ्य मानकों को फॉलो करने के लिए मजबूर करता है।

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग के क्या फायदे हो सकते हैं?

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का मतलब है कि पोषण से जुड़ी जानकारी को पैकेजिंग के पिछले हिस्से की जगह आगे छापा जाए। इसके फायदे ऐसे हो सकते हैं-

  • वॉर्निंग लेबल- अगर किसी प्रोडक्ट में कैलोरी, फैट या चीनी की मात्रा 10% से ज्यादा है, तो उस पर लाल रंग का वॉर्निंग साइन होता है। 
  • हेल्थ स्टार रेटिंग- 0.5 से 5 स्टार तक की रेटिंग उपभोक्ता को एक नजर में यह समझने में मदद करती है कि जो फूड आइटम वे खा रहे हैं, वह कितना हेल्दी है। फूड पैकेजिंग पर जितने स्टार, प्रोडक्ट उतना ज्यादा हेल्दी।  
  • न्यूट्री-स्कोर- रंगों के माध्यम से खाने की गुणवत्ता को बताना, जैसे-
  1. गहरा हरा- सबसे हेल्दी
  2. हरा- हेल्दी
  3. पीला- मॉडिरेट
  4. नारंगी- अनहेल्दी
  5. गहरा नारंगी- बिल्कुल अनहेल्दी
  • तुरंत फैसला- एक व्यस्त कंज्यूमर को पोषण चार्ट पढ़ने में समय बर्बाद नहीं करना पड़ेगा और वह सेकंडों में सही  चुनाव कर सकता है।
  • व्यवहार में बदलाव- साफ चेतावनी देखकर लोगों के व्यवहार में बदलाव आ सकता है और वे अनहेल्दी चीजें कम खरीदेंगे। 

मोटापे और डायबिटीज के खिलाफ एक हथियार

भारत में 2030 तक लगभग 2.7 करोड़ बच्चों के मोटापे का शिकार होने की आशंका है। ऐसे में लेबलिंग देखकर माता-पिता बच्चों के लिए स्नैक्स चुनते समय ज्यादा सतर्क रहेंगे। ज्यादा स्टार या ग्रीन लेबल वाले उत्पादों की मांग बढ़ेगी।

आंकड़ों के मुताबिक भारत में 15.3% आबादी प्री-डायबिटिक है। अगर ये लोग समय रहते अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स में मौजूद हाई शुगर और कार्ब्स को पहचान लें, तो वे बीमारी को टाल सकते हैं।

फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग से जुड़ी चुनौतियां

हालांकि फूड इंडस्ट्री का तर्क है कि भारत की विविध खान-पान की आदतों के कारण यह लेबलिंग मॉडल यहां ठीक नहीं बैठेंगे, लेकिन बीमारियों से बचाव के लिए खान-पान की चीजों पर ज्यादा आसानी से समझ आने वाली और क्लीयर लेबलिंग बेहद आज के समय की जरूरत बन गई है। 








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