परमेश्वर राजपूत,गरियाबंद/छुरा :6 अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस के अवसर पर जिले के कई शासकीय संस्थानों, विशेषकर सहकारी समितियों में पार्टी पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा कार्यक्रम आयोजित किए जाने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। इन आयोजनों में समिति प्रबंधकों की मौजूदगी और सरकारी परिसरों के उपयोग को लेकर विपक्षी दलों सहित आम नागरिकों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।बताया जा रहा है कि स्थापना दिवस के नाम पर कई सहकारी समितियों और सरकारी कार्यालयों में भाजपा से जुड़े लोगों ने एकत्र होकर कार्यक्रम मनाया। इस दौरान पार्टी के झंडे, बैनर और नारों के साथ आयोजन किए गए, जिनमें कुछ जगहों पर संबंधित संस्थाओं के अधिकारी एवं कर्मचारी भी शामिल नजर आए।इस घटनाक्रम के बाद विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि सरकारी संस्थाएं किसी भी राजनीतिक दल की गतिविधियों के लिए मंच नहीं बन सकतीं। विपक्ष का आरोप है कि यह सरकारी तंत्र के राजनीतिकरण का स्पष्ट उदाहरण है, जिससे निष्पक्षता और प्रशासनिक मर्यादा पर सवाल खड़े होते हैं।
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वहीं, आम लोगों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ नागरिकों ने इसे “लोकतंत्र का मज़ाक” बताते हुए कहा कि सरकारी परिसरों का उपयोग केवल प्रशासनिक कार्यों के लिए होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रमों के लिए। वहीं कुछ लोग इसे सामान्य राजनीतिक गतिविधि मानते हुए ज्यादा गंभीर मुद्दा नहीं मान रहे।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संविधान और प्रशासनिक नियमों के अनुसार सरकारी संस्थानों की निष्पक्षता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। किसी भी दल द्वारा सरकारी कार्यालयों में कार्यक्रम आयोजित करना न केवल नैतिक सवाल खड़े करता है, बल्कि यह प्रशासनिक आचार संहिता के उल्लंघन की श्रेणी में भी आ सकता है।हालांकि इस पूरे मामले में अब तक प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन बढ़ते विवाद को देखते हुए यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गरमा सकता है।अब बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों को सरकारी परिसरों में इस तरह के आयोजन की अनुमति होनी चाहिए, या फिर इसके लिए सख्त दिशा-निर्देश और नियंत्रण जरूरी हैं?


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