'रुद्राक्ष' एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही मन में सबसे पहले भगवान शिव (Lord Shiva) की शांत और वैरागी छवि उभर आती है। आपने साधु-संतों से लेकर अपने आस-पास के आम लोगों तक, बहुत से लोगों को गले या कलाई में रुद्राक्ष पहने देखा होगा। लोग इसे बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ धारण करते हैं। लेकिन, क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर यह रहस्यमयी रुद्राक्ष धरती पर आया कैसे?यह कोई साधारण चीज नहीं है, बल्कि इसके जन्म के पीछे एक बेहद भावुक कथा है। आइए, जानते हैं कि रुद्राक्ष का जन्म कैसे हुआ और क्यों इसे इतना पवित्र माना जाता है।
हजारों साल की तपस्या और महादेव की करुणा
रुद्राक्ष की उत्पत्ति की सबसे प्रामाणिक और सटीक कथा हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथ 'शिव पुराण' (विद्येश्वर संहिता) में मिलती है। शिव पुराण में लिखे वर्णन के अनुसार, सतयुग की बात है, जब त्रिपुर नाम का राक्षस ब्रह्माजी से वरदान पाकर बहुत शक्तिशाली हो गया और तीनों लोकों को नष्ट करने की योजना बनाने लगा। देवताओं की विनती पर भगवान शिव ने उसके साथ भीषण युद्ध किया। इस कठिन संघर्ष के दौरान महादेव के आंसू धरती पर अलग-अलग जगहों पर गिरे, जिनसे बाद में रुद्राक्ष के पवित्र वृक्ष उत्पन्न हुए।
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इन्हीं पेड़ों पर जो फल लगे, उनके अंदर के बीजों को 'रुद्राक्ष' कहा गया। अगर आप इस शब्द को थोड़ा ध्यान से समझें, तो यह दो शब्दों से मिलकर बना है 'रुद्र' (यानी भगवान शिव का एक नाम) और 'अक्ष' (जिसका मतलब आंख या आंसू होता है)। इसका सीधा सा अर्थ है- भगवान शिव की आंखों के आंसू।
क्यों इतना खास है रुद्राक्ष?
यही वजह है कि रुद्राक्ष को महज एक लकड़ी का मनका नहीं माना जाता। यह शिव का साक्षात प्यार और उनका आशीर्वाद है। माना जाता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से रुद्राक्ष पहनता है, उस पर शिव की वह करुणा हमेशा बनी रहती है और उसे जीवन के तनाव से मुक्ति मिलती है।
तमाम धार्मिक ग्रंथ और पौराणिक शास्त्र इस बात के गवाह हैं कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति स्वयं भगवान शिव से हुई है। यही कारण है कि सनातन धर्म में रुद्राक्ष को महादेव का ही साक्षात रूप मानकर पूजा जाता है। इसे न केवल अत्यंत पवित्र माना गया है, बल्कि यह लंबी उम्र और बेहतर स्वास्थ्य देने वाला भी माना जाता है।


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