स्कूल परिसर में 24 घंटे तड़पती रही गाय, प्रिंसिपल की लापरवाही पर उठा बड़ा सवाल

स्कूल परिसर में 24 घंटे तड़पती रही गाय, प्रिंसिपल की लापरवाही पर उठा बड़ा सवाल

अरुण शर्मा संवाददाता किरंदुल :कुंवाकोंडा ब्लॉक के शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय किरंदुल में मानवता को शर्मसार कर देने वाली लापरवाही का मामला सामने आया है। यहां एक गाय स्कूल की बाउंड्रीवाल के अंदर 24 घंटे से अधिक समय तक फंसी रही, लेकिन जिम्मेदारों ने समय रहते कोई कदम नहीं उठाया।बताया जा रहा है कि शनिवार शाम से ही गाय विद्यालय परिसर में बंद थी। शिक्षक आवास में रहने वाले शिक्षकों ने तत्काल प्रिंसिपल कु. मगरिता टोप्पो को इसकी सूचना दी, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उन्होंने इस गंभीर स्थिति को नजरअंदाज कर दिया। पूरी रात गाय भूख-प्यास से तड़पती रही और जोर-जोर से चिल्लाती रही, फिर भी स्कूल का गेट नहीं खोला गया।रविवार दोपहर करीब 12 बजे के बाद आखिरकार गौ सेवकों को बुलाया गया। मौके पर पहुंचे गौ सेवा आयोग ब्लॉक अध्यक्ष रामकृष्ण बैरागी और उनकी टीम ने जब स्थिति देखी तो हैरान रह गए। करीब 8 फीट ऊंची दीवार से घिरे मैदान में फंसी गाय बाहर निकलने में असमर्थ थी। जब उसे पानी दिया गया तो उसने एक ही सांस में पूरी बाल्टी खाली कर दी, जिससे उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

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 गौ सेवकों ने लगाए गंभीर आरोप

गौ सेवकों ने इस घटना को सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया कृत्य बताया। उनका कहना है कि पहले भी इस तरह की घटनाएं सामने आ चुकी हैं और प्रिंसिपल पर गायों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप लगते रहे हैं। स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि गायों को पौधों से दूर रखने के नाम पर उन्हें जानबूझकर बंद किया जाता है।

गौ सेवा आयोग के ब्लॉक अध्यक्ष रामकृष्ण बैरागी ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,
“यह बेहद निंदनीय और अमानवीय घटना है। अगर इस जगह कोई छोटा बच्चा फंस जाता तो क्या होता? यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर अपराध है। हम इस मामले में थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराएंगे और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग करेंगे।”

 प्रिंसिपल की भूमिका पर सवाल

शिक्षकों के मुताबिक, उन्होंने समय रहते सूचना दे दी थी, लेकिन प्रिंसिपल ने कार्रवाई नहीं की। वहीं, प्रिंसिपल का यह कहना कि उन्हें जानकारी नहीं थी, पूरे मामले को और संदिग्ध बना देता है।
 प्रशासन पर उठे सवालयह घटना न सिर्फ एक सरकारी स्कूल की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारियों की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है। एक ओर जहां गौ सेवकों की तत्परता सराहनीय है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग और प्रशासन की चुप्पी चिंता का विषय बनी हुई है।








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