अभी करें बाजरे की बुवाई, गर्मियों में मिलेगा शानदार उत्पादन और हरा चारा

अभी करें बाजरे की बुवाई, गर्मियों में मिलेगा शानदार उत्पादन और हरा चारा

क्या आप ऐसी फसल की तलाश में हैं जो कम पानी, कम लागत और कम समय में अच्छी कमाई दे? बाजरा किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभर रहा है, खासतौर पर गर्मियों के मौसम में. सूखा सहन करने वाली यह फसल न सिर्फ पौष्टिक अनाज देती है, बल्कि पशुओं के लिए बढ़िया चारा भी उपलब्ध कराती है. सही किस्म और बुवाई के तरीके अपनाकर किसान इससे अपनी आमदनी में बड़ा इजाफा कर सकते हैं.

गर्मियों में बाजरे की खेती किसानों के लिए अन्य फसलों के मुकाबले काफी फायदेमंद मानी जा रही है. यह फसल कम लागत में अच्छी आमदनी देने वाली होती है. बाजरा खासतौर पर गर्मी और कम पानी वाले इलाकों के लिए उपयुक्त है, क्योंकि इसे ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं होती और यह सूखा सहन करने की क्षमता रखता है. किसान इसकी खेती से दोहरा लाभ प्राप्त करते हैं. एक तरफ उन्हें पौष्टिक अनाज मिलता है, वहीं दूसरी ओर इसका हरा चारा पशुओं के लिए बेहद फायदेमंद होता है. कम समय में तैयार होने वाली यह फसल किसानों की आय बढ़ाने में मददगार साबित हो रही है.

जिला कृषि रक्षा अधिकारी विजय कुमार ने बताया कि मोटे अनाजों में बाजरा एक ऐसी फसल है, जिसकी खेती कई किसान करते हैं और इसकी बाजार में अच्छी बिक्री भी होती है. बाजरा की डिमांड अधिक होने के कारण किसानों को अच्छा लाभ मिलता है. उन्होंने कहा कि यदि किसान गर्मी के सीजन में इसकी खेती करना चाहते हैं, तो वे इसकी कुछ उन्नत किस्मों को अपनाकर कम लागत और कम समय में अधिक पैदावार हासिल कर सकते हैं.

आर.एच.बी. 177 बाजरे की यह किस्म 60-70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. यह जोगिया रोग प्रतिरोधी होने के साथ-साथ सूखा सहन करने की क्षमता भी रखती है. इस किस्म से 42 से 43 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है.

एच.एच.बी. 67-2 बाजरे की यह किस्म 60-65 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. यह अगेती और पछेती दोनों तरह की बुआई के लिए उपयुक्त मानी जाती है. इस किस्म से 22 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है.

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एच.एच.बी. 299 बाजरे की इस किस्म की बाली लंबी और चमकदार होती है और इसके दाने मोटे होते हैं. यह लगभग 75-80 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. यह किस्म प्रमुख बीमारियों और कीटों के प्रति प्रतिरोधी मानी जाती है. इससे 30 से 32 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है.

आर.एच.बी. 223 बाजरे की यह किस्म लगभग हर प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है. यह बुवाई के करीब 70-75 दिनों में पककर तैयार हो जाती है. यह किस्म जोगिया रोग के प्रति प्रतिरोधी होने के साथ-साथ सूखा सहन करने की क्षमता भी रखती है. इससे 28 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है.

डब्ल्यू.सी.सी. 75 बाजरे की यह संकुल किस्म देशी किस्मों की तुलना में बेहतर मानी जाती है. यह 70-80 दिनों में तैयार हो जाती है और प्रति हेक्टेयर 18-20 क्विंटल दाना और 85-90 क्विंटल कड़वी (चारा) की उपज देती है.

बाजरे की फसल के लिए 4-5 किलो बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है. इसकी बुवाई पंक्तियों में करनी चाहिए, जिससे फसल को कम पानी की जरूरत पड़ती है और पौधों को सही मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं. बुवाई के समय 45 सेंमी पंक्ति से पंक्ति की दूरी और 10-12 सेंमी पौधे से पौधे की दूरी रखनी चाहिए. साथ ही बीज को 2-3 सेंमी गहराई पर बोना उपयुक्त रहता है.








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