छत्तीसगढ़ में इस सब्जी की खेती का बढ़ा रुझान, गर्मी में सेहत का खजाना

छत्तीसगढ़ में इस सब्जी की खेती का बढ़ा रुझान, गर्मी में सेहत का खजाना

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खानपान संस्कृति में रोपा भाजी का विशेष स्थान है. स्वाद और पोषण से भरपूर यह देसी सब्जी गर्मियों के मौसम में खासतौर पर बोरे-बासी के साथ बड़े चाव से खाई जाती है. इसे अपने घरों की क्यारी या खेत में आसानी से उगा लेते हैं. खास बात यह है कि रोपा भाजी को उगाने की विधि अन्य सब्जियों से अलग और बेहद सरल होती है.रोपा भाजी लगाने के लिए सबसे पहले मिट्टी की सही तैयारी जरूरी होती है.इसके लिए हल्की दोमट मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है.खेत या क्यारी को अच्छी तरह जोतकर भुरभुरी बना लिया जाता है, जिससे पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकें.इसके बाद उसमें गोबर की खाद मिलाई जाती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता है.

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इस भाजी की खासियत यह है कि इसे बीज से नहीं, बल्कि कटिंग या पौधरोपण विधि से लगाया जाता है.इसके लिए पहले से तैयार पौधों के डंठलों को 3 से 4 इंच की लंबाई में काटा जाता ह. इन छोटे-छोटे टुकड़ों को ही रोपण के लिए इस्तेमाल किया जाता है.रोपण की प्रक्रिया को स्थानीय भाषा में रोपा कहा जाता है.तैयार क्यारी में इन डंठलों को करीब 2 से 3 इंच की दूरी पर सीधे मिट्टी में दबा दिया जाता है.यह विधि आसान होने के साथ-साथ कम समय में अच्छे परिणाम देती है.रोपण के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना जरूरी होता है, ताकि पौधे जल्दी जड़ पकड़ सकें और उनका विकास तेजी से हो.

रोपा भाजी गर्मियों के मौसम में बहुत तेजी से बढ़ता
रोपा भाजी की एक और खास बातहै कि यह गर्मियों के मौसम में बहुत तेजी से बढ़ती है. यहां ज्यादा देखभाल की भी जरूरत नहीं होती है. यह कम पानी और सीमित संसाधनों में भी अच्छी पैदावार देती है, जिससे यह ग्रामीण किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प बन जाती है. पोषण की दृष्टि से भी रोपा भाजी बेहद फायदेमंद मानी जाती है.यह शरीर को ठंडक पहुंचाने के साथ-साथ जरूरी विटामिन और खनिज भी प्रदान करती है. यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में यह आज भी लोगों की पसंदीदा भाजी बनी हुई है.

 








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