वट सावित्री व्रत क्यों रखा जाता है? पढ़ें सावित्री-सत्यवान की पूरी पौराणिक कहानी

वट सावित्री व्रत क्यों रखा जाता है? पढ़ें सावित्री-सत्यवान की पूरी पौराणिक कहानी

हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को रखा जाने वाला यह उपवास सौभाग्यवती महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य और सुखद वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है। इस साल 16 मई को वट सावित्री का व्रत रखा जाएगा। आपको बता दें कि वट सावित्री व्रत  प्रेम, त्याग और एक पत्नी के अडिग संकल्प की विजय गाथा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन महान पतिव्रत माता सावित्री ने अपने विवेक और पतिव्रत धर्म के बल पर मृत्यु के देवता यमराज को भी झुकने पर मजबूर कर दिया था। उन्होंने यम देवता से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले आई थीं।  इस व्रत में वट (बरगद) वृक्ष की पूजा की जाती है जिसे दीर्घायु और अमरत्व का प्रतीक माना जाता है।  वट सावित्री का व्रत  सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा को सुनें बिना अधूरा माना जाता है।  तो आइए जानते हैं कि कैसे सावित्री ने अपनी बुद्धिमानी से असंभव को संभव कर दिखाया और यमराज के पाश से अपने पति को मुक्त कराया।

वट सावित्री व्रत की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति ने संतान प्राप्ति के लिए अपनी पत्नी सहित देवी सावित्री की कठोर तपस्या और विधिपूर्वक पूजन किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई। देवी के नाम पर ही उन्होंने पुत्री का नाम सावित्री रखा।

सावित्री के विवाह योग्य होने पर राजा अश्वपति ने उन्हें स्वयं अपना वर चुनने के लिए मंत्रियों के साथ भ्रमण पर भेजा। वहां उन्होंने निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना। जब सावित्री लौटकर आईं, तो उसी समय देवर्षि नारद वहां उपस्थित हुए। नारदजी ने भविष्यवाणी की कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के ठीक एक वर्ष पश्चात उनकी मृत्यु हो जाएगी।

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यह सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो गए और उन्होंने सावित्री को किसी अन्य वर को चुनने की सलाह दी, परंतु सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं। उन्होंने कहा, "पिताजी, कन्यादान एक ही बार होता है।" अंततः उनका विवाह सत्यवान से हुआ। नारदजी से सत्यवान की मृत्यु का निश्चित समय जानकर सावित्री राजमहल त्यागकर अपने पति और दृष्टिहीन सास-ससुर की सेवा के लिए तपोवन (जंगल) में रहने लगीं।

नारदजी द्वारा बताए गए समय के निकट आते ही सावित्री ने अत्यंत कठिन व्रत और तपस्या शुरू कर दी। जब नियत समय पर यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए और उन्हें अपने साथ ले जाने लगे, तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। उनकी इस अटूट श्रद्धा और धर्म-निष्ठा को देखकर यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें वर मांगने को कहा। सावित्री ने विवेकपूर्वक एक-एक कर वरदान मांगे। पहले वरदान में  सावित्री ने अपने नेत्रहीन सास-ससुर की आंखों की ज्योति और उनके दीर्घायु होने की कामना की। यमराज के मना करने के बावजूद पीछे आता देख, उन्होंने दूसरे वर में अपने ससुर का खोया हुआ राज्य और वैभव वापस मांग लिया। तीसरे वरदान में सावित्री ने बड़ी चतुराई और बुद्धिमानी से यम देव से 'सौ पुत्रों की माता' होने का वरदान मांगा। चूंकि वह एक पतिव्रता स्त्री थीं, इसलिए उनके इस वरदान को पूर्ण करने के लिए यमराज को विवश होकर सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े। इस प्रकार सावित्री ने न केवल अपने पति को मृत्यु के मुख से सुरक्षित निकाला, बल्कि अपने विवेक और पतिव्रत धर्म के बल पर पूरे परिवार का उद्धार किया।








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