सिख धर्म (Sikhism) दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा धर्म, जिसकी स्थापना गुरु नानक देव जी द्वारा 15वीं शताब्दी (1469-1539) में कई गई थी। आज के समय में सिख धर्म गुरुओं की शिक्षाओं और उनके अनुयायियों की भक्ति से विकसित होकर वैश्विक धर्म बन गया है।
सिख धर्म में महिलाओं समेत सभी अमृतधारी और आस्थावान सिखों को बाल न काटने की परंपरा और धार्मिक मर्यादा क सम्मान करना बेहद जरूरी है। सिख धर्म में 5 ककारों में से एक 'क' केश भी है।खालसा कहलाने की इच्छा रखने वाले सभी लोगों इन पांच ककारों का पालन करना होता है, जिसमें केश, कांगा, कृपाण, कचेरा और काड़ा शामिल है।
सिख धर्म में बालों के साथ छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति के अनुसार, सभी सिख पुरुष और महिला को बाल काटने की अनुमति नहीं है। खालसा कहलाने वाले सभी लोग बालों को कैंची या चाकू से छूने नहीं देते। वे अपने बालों को बिना काटे, गांठ बांधकर रखते हैं, ताकि आसानी से संभल सकें।
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गुरु नानक देव जी 'आसा दी वार' में कहते थे कि, खुले बाल उस धूल की तरह है, जो आंखों को धुंधला कर देती है। उन्होंने सिखों को आदेश दिया कि, बालों को रोजाना अच्छे से धोए। वहीं महिलाओं से भी यही उम्मीद की जाती है कि, वे अपने बालों को लंबा रखें।
सिख धर्म केश का सम्मान करना क्यों जरूरी?
खासकर अमृतदारी सिख समुदाय में इसे गंभीर धार्मिक अनुशासन माना जाता है। सिख धर्म में केश रखने के पीछे तर्क केवल परंपरा नहीं, बल्कि पहचान, समानता और ईश्वर की रचना को स्वीकार करने की भावना का सम्मान है। गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना के समय केशों को सिख पहचान का जरूरी हिस्सा बनाया था।
सबसे जरूरी बात यह है कि, सिख धर्म में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग से धार्मिक नियम नहीं बनाए गए हैं, जिस प्रकार पुरुषों को बाल काटना नियमों के खिलाफ माना जाता है, उसी तरह से महिलाओं पर यही नियम लागू होते हैं।


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