सनातन नहीं मिटेगा, सनातन को मिटाने वाले ही मिट जाएंगे — जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज

सनातन नहीं मिटेगा, सनातन को मिटाने वाले ही मिट जाएंगे — जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज

चिरमिरी :  श्रीरामकथा प्रथम दिन लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम, गोदरीपारा चिरमिरी में आयोजित भव्य श्रीराम कथा महोत्सव का शुभारंभ ऐतिहासिक कलश यात्रा के पश्चात श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में हुआ। शाम 4 बजे से कथा व्यासपीठ पर विराजमान पद्मविभूषित तुलसीपीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज ने कथा के महत्व, सत्संग की महिमा और सनातन धर्म की शक्ति पर विस्तार से प्रकाश डाला।

अपने उद्बोधन में जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “सनातन धर्म कभी समाप्त नहीं हो सकता। सनातन को मिटाने का प्रयास करने वाले स्वयं ही मिट जाते हैं।” उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जिन्होंने भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का अपमान किया, उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़े।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती सरकार ने भी कई अवसरों पर सनातन संस्कृति का अपमान किया और उसे मानने तक से इनकार किया, जिसका परिणाम जनता ने स्वयं देखा। महाराज श्री ने कहा कि धर्म और संस्कृति के विरुद्ध चलने वाली शक्तियां कभी स्थायी नहीं रहतीं।

ये भी पढ़े :मुखिया के मुखारी - पैसा सबसे ज्यादा जरुरी है

“दूसरों के लिए वही सोचें जो अपने लिए अच्छा लगे”

कथा के दौरान उन्होंने जीवन व्यवहार से जुड़ी सीख देते हुए कहा कि मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो उसे स्वयं के लिए अच्छा लगे। यदि किसी व्यक्ति को स्वयं को “चोर” कहलाना अच्छा नहीं लगता, तो उसे किसी अन्य को भी ऐसे शब्द नहीं कहने चाहिए। उन्होंने कहा कि वाणी की पवित्रता ही अच्छे समाज की पहचान होती है।

संत सेवा और सत्संग की महिमा का किया वर्णन

जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज ने कहा कि संतों की सेवा करने से जीवन के सभी कष्ट और पीड़ाएं दूर हो जाती हैं। संतों के यहां कभी विलंब नहीं होता, वहां श्रद्धा और विश्वास रखने वालों को समय पर कृपा प्राप्त होती है।

उन्होंने कहा कि सत्संग केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि जीवन को बदलने वाला माध्यम है। सत्संग से मनुष्य को अर्थ, धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है। उन्होंने पुराणों के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान शंकर ने सत्संग किया तो उन्हें अनेक दिव्य उपलब्धियां प्राप्त हुईं, जबकि माता सती ने सत्संग का महत्व नहीं समझा, इसलिए उन्हें वह फल नहीं मिला।

भगवान दर्शन की छटपटाहट ही सच्चा सत्संग

कथा व्यासपीठ से उन्होंने कहा कि सच्चे सत्संग का सबसे बड़ा स्वरूप भगवान के दर्शन के लिए मन में उत्पन्न होने वाली छटपटाहट है। उन्होंने भगवान शिव के उस प्रसंग का वर्णन किया जिसमें वे भगवान श्रीराम के दर्शन के लिए व्याकुल हो उठे थे।

उन्होंने कहा कि सत्संग करने वाला व्यक्ति कभी असत्य का मार्ग नहीं अपनाता। भगवान शिव द्वारा माता सती को समझाने वाले प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब सती ने असत्य और संदेह का मार्ग अपनाया, तब भगवान शिव ने उन्हें त्याग दिया। यह प्रसंग सत्य और विश्वास के महत्व को दर्शाता है।

भक्ति और श्रद्धा से सराबोर रहा कथा स्थल

श्रीराम कथा के प्रथम दिवस बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। कथा स्थल पर “जय श्रीराम” के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। आयोजन समिति द्वारा श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, बैठक व्यवस्था और अन्य सुविधाओं की विशेष व्यवस्था की गई थी।

कथा के दौरान श्रद्धालु भाव-विभोर होकर संत वचनों का श्रवण करते रहे। आयोजन समिति ने बताया कि आगामी दिनों में कथा में विभिन्न धार्मिक प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया जाएगा।








You can share this post!


Click the button below to join us / हमसे जुड़ने के लिए नीचें दिए लिंक को क्लीक करे


Related News



Comments

  • No Comments...

Leave Comments