लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या सत्ता का प्रचारक? गिरती साख, बदलते सरोकार और मुद्दाविहीन होती पत्रकारिता पर गंभीर सवाल

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या सत्ता का प्रचारक? गिरती साख, बदलते सरोकार और मुद्दाविहीन होती पत्रकारिता पर गंभीर सवाल

परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद : भारत में पत्रकारिता को कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था, जनता की आवाज़ बनता था और अन्याय के खिलाफ कलम उठाता था। लेकिन वर्तमान दौर में पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। आज मीडिया की विश्वसनीयता पर सबसे अधिक प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं। जनता के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि पत्रकारिता अब मिशन नहीं, बल्कि व्यवसाय, प्रभाव और सत्ता से निकटता का माध्यम बनती जा रही है।एक समय था जब अखबारों की सुर्खियां किसानों, मजदूरों, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से भरी रहती थीं। पत्रकार गांव-गांव जाकर जनसमस्याएं उजागर करते थे। लेकिन आज मीडिया का बड़ा हिस्सा नेताओं की प्रेस विज्ञप्तियों, स्वागत कार्यक्रमों, फोटो सेशन और राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित होता जा रहा है। जनहित के मुद्दे धीरे-धीरे हाशिये पर धकेले जा रहे हैं।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि पत्रकारिता का एक वर्ग सत्ता और नेताओं के “प्रचार तंत्र” में बदलता दिखाई दे रहा है। कई पत्रकार निष्पक्षता की बजाय राजनीतिक दलों के समर्थक या विरोधी के रूप में देखे जाने लगे हैं। सत्ता के करीब रहने की होड़ ने पत्रकारिता की गरिमा को प्रभावित किया है। सवाल पूछने की परंपरा कमजोर पड़ रही है और “मैनेज खबरों” का दौर बढ़ता जा रहा है।पत्रकारिता में बढ़ती आर्थिक असुरक्षा भी इस गिरावट का एक बड़ा कारण है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक पत्रकार बिना नियमित वेतन, संसाधन और सुरक्षा के काम कर रहे हैं। ऐसे में कुछ लोग पत्रकारिता को समाज सेवा के बजाय जीवन यापन और व्यक्तिगत प्रभाव बढ़ाने का जरिया बना लेते हैं। प्रेस कार्ड अब कई जगह पहचान से ज्यादा “रौब” का प्रतीक बनता जा रहा है। यही कारण है कि समाज में पत्रकारों की छवि को लेकर भी मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

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सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इस संकट को और गहरा किया है। आज “पहले खबर चलाने” की होड़ में तथ्य जांच और जिम्मेदारी पीछे छूटती जा रही है। टीआरपी और व्यूज़ की दौड़ में सनसनी, विवाद और राजनीतिक बहसों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि आम आदमी की समस्याएं चर्चा से गायब होती जा रही हैं। कई चैनलों की बहसें अब पत्रकारिता कम और राजनीतिक अखाड़ा अधिक लगती हैं।मुद्दाविहीन होती मीडिया लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। जब मीडिया जनता के मूल सवालों से भटक जाती है, तब सत्ता जवाबदेही से मुक्त होने लगती है। पत्रकारिता का काम केवल नेताओं के भाषण दिखाना नहीं, बल्कि यह पूछना भी है कि गांव में पानी क्यों नहीं पहुंचा, अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक क्यों नहीं हैं और युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिल रहा।हालांकि आज भी अनेक ईमानदार और निर्भीक पत्रकार हैं जो कठिन परिस्थितियों में जनहित की पत्रकारिता कर रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में कई पत्रकार सीमित संसाधनों के बावजूद भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और जनसमस्याओं को सामने ला रहे हैं। यही लोग पत्रकारिता की असली उम्मीद हैं। जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल उद्देश्य की ओर लौटे — सत्ता की नहीं, समाज की आवाज़ बने।मीडिया संस्थानों को भी आत्ममंथन करना होगा। पत्रकारिता यदि केवल विज्ञापन, राजनीतिक निकटता और निजी हितों तक सीमित हो जाएगी, तो जनता का विश्वास लगातार कमजोर होता जाएगा। लोकतंत्र में मीडिया की ताकत उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता होती है, न कि सत्ता के साथ उसकी निकटता।आज आवश्यकता “शोर” नहीं, “सरोकार” वाली पत्रकारिता की है। पत्रकारिता का अर्थ केवल खबर दिखाना नहीं, बल्कि समाज को सच से अवगत कराना है। यदि मीडिया अपने मूल दायित्वों से भटकती रही, तो लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ भीतर से खोखला होता जाएगा।







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