परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद विशेष समाचार :देश की सर्वोच्च और कभी सबसे विश्वसनीय मानी जाने वाली जांच एजेंसी सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। समय-समय पर सीबीआई पर सत्ता पक्ष के प्रभाव में काम करने और निष्पक्ष जांच नहीं करने के आरोप लगते रहे हैं। अब कुछ पुराने चर्चित मामलों में रिश्वत और जांच प्रभावित करने जैसे गंभीर आरोपों ने एजेंसी की साख को फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है।छत्तीसगढ़ के चर्चित बिलासपुर के पत्रकार सुशील पाठक हत्याकांड में वर्ष 2010 के दौरान भी सीबीआई अधिकारियों पर रिश्वत लेने के आरोप सामने आए थे। उस समय यह मामला काफी चर्चा में रहा और जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए थे।
वहीं अब वर्ष 2011 के बहुचर्चित उमेश राजपूत हत्याकांड में भी नए विवाद ने जन्म ले लिया है। इस मामले में पूर्व जांच अधिकारी रहे सीबीआई के तत्कालीन डीवाईएसपी नमो प्रकाश मिश्रा ने सोशल मीडिया के माध्यम से सीबीआई के ही कुछ जांच अधिकारियों पर इस हत्याकांड में रिश्वत लेने और जांच को प्रभावित करने और अपराधियों को बचाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके दावों के बाद एक बार फिर सीबीआई की कार्यप्रणाली को लेकर बहस तेज हो गई है।
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि यदि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी पर ही निष्पक्षता और ईमानदारी को लेकर सवाल उठने लगें, तो आम जनता का भरोसा न्याय व्यवस्था से कमजोर हो सकता है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि या स्वतंत्र जांच अभी सामने नहीं आई है, लेकिन सोशल मीडिया और जनचर्चा में यह मुद्दा लगातार तूल पकड़ रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि देश की जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है, ताकि आम नागरिकों का सीबीआई जैसी देश के सर्वोच्च जांच एजेंसी पर विश्वास कायम रह सके।

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