सुरक्षा की गुहार पर जिला प्रशासन मौन! क्या फिर किसी पत्रकार परिवार के मौत की घटना का इंतजार? डर के साए में जीने को मजबूर किया जा रहा है?

सुरक्षा की गुहार पर जिला प्रशासन मौन! क्या फिर किसी पत्रकार परिवार के मौत की घटना का इंतजार? डर के साए में जीने को मजबूर किया जा रहा है?

परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद /छुरा : छत्तीसगढ़ राज्य के गरियाबंद जिले के छुरा नगर में वर्ष 2011 में हुई पत्रकार उमेश राजपूत की सनसनीखेज हत्या के पंद्रह वर्ष बाद भी न तो हत्यारे कानून के शिकंजे में आ सके हैं और न ही पीड़ित परिवार को सुरक्षा मिल पाई है। अब उसी परिवार के सदस्य को दोबारा जान से मारने की धमकी मिलने के बावजूद जिला प्रशासन की ओर से सुरक्षा या आत्मरक्षा हेतु हथियार लाइसेंस पर निर्णय नहीं लिया जाना गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।जानकारी के अनुसार 23 जनवरी 2011 को छुरा नगर निवासी पत्रकार उमेश राजपूत की उनके ही निवास पर अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। घटना के बाद स्थानीय पुलिस ने जांच शुरू की, लेकिन अपराधियों तक नहीं पहुंच सकी। बाद में मामला सीबीआई को सौंपा गया, जहां आज भी जांच जारी बताई जाती है, लेकिन इतने वर्षों बाद भी अपराधी पकड़ से बाहर हैं।

परिजनों का आरोप है कि पत्रकार उमेश राजपूत ने हत्या से कुछ दिन पूर्व ही एक अस्पताल की घटना को लेकर कुछ लोगों से अपने जीवन को खतरा बताते हुए पुलिस से सुरक्षा की मांग की थी, लेकिन उन्हें सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके बाद उनकी हत्या हो गई। अब ठीक उसी तरह की परिस्थितियां फिर से परिवार के सामने खड़ी हो गई हैं।बताया जा रहा है कि याचिकाकर्ता, जो मृतक पत्रकार के छोटे भाई हैं, को कुछ समय पूर्व घर पर पत्र फेंककर गोली मारने की धमकी दी गई थी। इस मामले में स्थानीय थाने में शिकायत दर्ज कराई गई और जांच शुरू हुई, लेकिन पुलिस अब तक धमकी देने वालों तक नहीं पहुंच सकी। इसके बाद पीड़ित परिवार ने अपनी सुरक्षा की मांग प्रशासन से की, लेकिन सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई।

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परिवार का कहना है कि लगातार खतरे के माहौल को देखते हुए आत्मरक्षा के लिए बंदूक लाइसेंस हेतु आवेदन किया गया था। आवश्यक दस्तावेज जमा करने और सभी प्रक्रियाएं पूर्ण करने के बावजूद लगभग दो वर्षों से जिला प्रशासन द्वारा लाइसेंस जारी नहीं किया गया है। इससे पीड़ित परिवार खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस कर रहा है।अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब पहले भी सुरक्षा मांगने के बावजूद एक पत्रकार की हत्या हो चुकी है और जांच एजेंसियां पंद्रह वर्षों में अपराधियों को पकड़ने में असफल रही हैं, तो क्या प्रशासन फिर किसी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? क्या किसी व्यक्ति की मौत के बाद ही सुरक्षा व्यवस्था का औचित्य सिद्ध होता है?

स्थानीय लोगों और पत्रकारों में भी इस मामले को लेकर नाराजगी देखी जा रही है। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार धमकियां मिल रही हैं और पूर्व में उसी परिवार के सदस्य की हत्या हो चुकी है, तो प्रशासन को मामले की गंभीरता समझते हुए तत्काल सुरक्षा और आत्मरक्षा संबंधी मांगों पर निर्णय लेना चाहिए।फिलहाल पीड़ित परिवार भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन जीने को मजबूर है, जबकि जिला प्रशासन की चुप्पी कई सवालों को जन्म दे रही है।







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