हिंदू धर्म में शिव की भक्ति उनकी पूजा से भी सरल है। भगवान इतने भोले हैं कि, अगर उन्हें सच्ची श्रद्धा के साथ सिर्फ एक लोटा जल भी चढ़ाया जाए तो वह उसी में संतुष्ट हो जाते हैं, इसलिए तो उनका एक नाम भोलेनाथ भी है।
शिव भक्ति करने के लिए आपको कोई कठिन साधना करने की जरूरत नहीं है, बल्कि सच्चा भाव, समर्पण और सरलता के मार्ग पर चलकर शिव को प्राप्त किया जा सकता है।
शिव पुरान के अनुसार शिव से जुड़ी 9 प्रकार की भक्ति उन्हें शिव के समीप ले जाती है। जो इंसान को धीरे-धीरे अंदर से बदल कर रख देती है और आखिर में भक्त शिव को प्राप्त कर लेता है। आइए जानते हैं शिव से जुड़ी 9 प्रकार की भक्ति कौन-सी हैं?
श्रवण भक्ति
श्रवण भक्ति का अर्थ भगवान शिव से जुड़ी कथाओं, गुण, महिमा और पुराणों को श्रद्धा से सुनना ही श्रवण भक्ति कहलाता है। यह भक्ति का पहला चरण माना जाता है, जहां मन का ज्ञान से जुड़ाव होता है। शिव पुराण, कथा, शिव से जुड़े प्रवचन और संतों की बातों को ध्यान से सुनना ही श्रवण भक्ति कहलाती है। श्रवण भक्ति करने से मन शुद्ध होने के साथ भक्ति जाग्रत होती है।
कीर्तन भक्ति
भगवान के नाम और गणों का गान करना ही कीर्तन भक्ति कहलाता है। ऊं नमः शिवाय का जाप, भजन, कीर्तन और आरती करना ही कीर्तन भक्ति कहलाती है। कीर्तन भक्ति करने से वातावरण और मन दोनों पवित्र होते हैं।
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स्मरण भक्ति
हर समय मन में भगवान शिव को मन से याद करना ही स्मरण भक्ति कहलाता है। स्मरण भक्ति करना बेहद आसान है। चलते-फिरते, काम करते हुए शिव का नाम लाना या मुश्किल समय में शिव को याद करना ही स्मरण भक्ति कहलाता है। इसे करने से अंदर का डर खत्म होने के साथ विश्वास भी बढ़ता है।
पादसेवन भक्ति
पादसेवन भक्ति से तात्पर्य भगवान के चरण कमलों की सेवा करना वो भी सच्चे भाव के साथ पादसेवन भक्ति कहलाती है। मंदिरों में सेवा या जरूरतमंदों की मदद करके इस तरह की भक्ति की जाती है। पादसेवन भक्ति करने से मन का अहंकार कम होता है। इसके साथ ही करुणा का भाव भी बढ़ता है।
अर्चन भक्ति
घर में पूजा करना, जल, बेलपत्र और फल-फूल अर्पित करना ही अर्चन भक्ति है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने से और सोमवार के दिन व्रत रखने से अर्चन भक्ति की प्राप्ति होती है। अर्चन भक्ति करने से मन में अनुशासन और पवित्रता का भाव उत्पन्न होता है।
वंदन भक्ति
वंदन भक्ति से तात्पर्य भगवान शिव को प्रणाम करना, नमस्कार वंदन करना है। नियमित रूप से सुबह-शाम उनका वंदन करना और उनके प्रति धन्यवाद की भावना रखना ही वंदन भक्ति कहलाती है। वंदन भक्ति करने से विनम्रता और शांति आती है।
दास्य भक्ति
दास्य भक्ति से मतलब अपने आपको भगवान शिव का दास या सेवक मान कर उनकी सेवा करना। जो व्यक्ति हर काम को शिव की सेवा से जोड़कर देखता है और अपने कार्यों के प्रति ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठा रखता है, वह दास्य भक्त कहलाता है। इसे करने से जीवन में निष्ठा और समर्पण की भावना आती है।
सख्य भक्ति
भगवान शिव को अपना मित्र मानना और उनसे बात करना ही सख्य भक्ति कहलाती है। हमेशा दिल की बातें शिव से कहें और उन्हें अपना सबसे करीबी साथ मानना। सख्य भक्ति करने से भगवान के प्रति विश्वास अटूट हो जाता है।
आत्मनिवेदन भक्ति
आत्मनिवेदन भक्ति का अर्थ अपने आप को पूरी तरह शिव को समर्पित कर देना ही सर्वोच्च भक्ति का प्रतीक है। हर स्थिति में शिव की इच्छा मानना और फल की चिंता न करना ही आत्मनिवेदन भक्ति कहलाती है। आत्मनिवेदन भक्ति करने से मोक्ष, शांति और पूर्ण संतोष की प्राप्ति होती है।

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