उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में आग लग जाने से 15 लोगों की जान चली गई। कई गंभीर रूप से झुलस गए। हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के एक होटल में लगी आग के बाद देश में ये दूसरा बड़ा अग्निकांड है। लखनऊ के अग्निकांड के बाद से एक बार फिर से कोचिंग संस्थानों, होटल, भवनों और कार्यालय में फायर सेफ्टी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
अस्पताल, होटल और स्कूल में आग रोकने के लिए नियम कानून
किसी बड़े अग्निकांड को रोकने के लिए देशभर में इसके लिए अलग से नियम-कानून बनाए गए हैं। अग्नि सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को लागू करने के लिए उत्तर प्रदेश फायर प्रिवेंशन एंड फायर सेफ्टी एक्ट, 2005 लागू है। इस कानून का उद्देश्य भवनों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, अस्पतालों, मॉल, होटल, स्कूल और अन्य सार्वजनिक परिसरों में आग लगने की घटनाओं को रोकना तथा लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
फायर सेफ्टी एक्ट के प्रमुख नियम
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हाल के हादसों के बाद बढ़ी चर्चा
लखनऊ समेत विभिन्न शहरों में आग की घटनाओं के बाद फायर सेफ्टी नियमों के पालन को लेकर सवाल उठे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश हादसों में फायर एनओसी का अभाव, आपातकालीन निकास की कमी, खराब वायरिंग और सुरक्षा उपकरणों की अनुपलब्धता प्रमुख कारण बनते हैं।
क्यों जरूरी है फायर सेफ्टी?
विशेषज्ञों के अनुसार, आग लगने की स्थिति में शुरुआती कुछ मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि भवन में फायर अलार्म, स्प्रिंकलर सिस्टम और सुरक्षित निकासी मार्ग मौजूद हों, तो बड़ी जनहानि को रोका जा सकता है। इसलिए फायर सेफ्टी एक्ट केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि लोगों की जान बचाने का महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है।
फायर लिफ्ट और पानी के पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था
विशेषज्ञों के अनुसार, ऊंची इमारतों में फायर लिफ्ट, पानी के पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था और बैकअप पावर सिस्टम भी होना चाहिए, ताकि आग लगने पर सुरक्षा उपकरण लगातार काम करते रहें। साथ ही भवनों में विद्युत वायरिंग और गैस पाइपलाइन की नियमित जांच भी अनिवार्य है।
समय-समय पर सुरक्षा मानकों की जांच
फायर विभाग समय-समय पर ऐसे भवनों का निरीक्षण कर सुरक्षा मानकों की जांच करता है। नियमों का पालन करने वाले संस्थानों को फायर एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) जारी किया जाता है, जबकि खामियां मिलने पर नोटिस, जुर्माना या अन्य कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

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