बेमेतरा टेकेश्वर दुबे :आरूग चौरा छत्तीसगढ़ी काव्य कला मंच द्वारा पी.जी. कॉलेज, बेमेतरा में आयोजित ‘बछर तिहार–2026’ साहित्य, संस्कृति एवं सृजन का अनुपम उत्सव बनकर उभरा। दिनभर चले इस भव्य आयोजन में नवा कलम प्रतियोगिता, पुस्तक विमोचन, थाथी सम्मान, साहित्यकार सम्मान तथा काव्य गोष्ठी जैसे विविध साहित्यिक कार्यक्रमों का सफल आयोजन हुआ। प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए साहित्यकारों, कवियों, रचनाकारों, समाजसेवियों, जनप्रतिनिधियों एवं साहित्यप्रेमियों की गरिमामयी उपस्थिति ने पूरे आयोजन को यादगार बना दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथि स्वागत एवं मंचासीन कार्यक्रम के साथ हुआ। प्रथम सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पी.सी. लाल यादव ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री रोहित साहू (अध्यक्ष, तहसील साहू संघ, बेमेतरा) तथा श्री ताराचंद माहेश्वरी (समाजसेवी) उपस्थित रहे। प्रथम सत्र का संचालन हरीश पटेल ने प्रभावशाली एवं साहित्यिक शैली में किया। संचालन के दौरान छत्तीसगढ़ी भाषा, संस्कृति और लोकधरोहर से जुड़े प्रेरणादायी विचारों ने उपस्थित जनसमूह को विशेष रूप से प्रभावित किया।
प्रथम सत्र का मुख्य आकर्षण ‘नवा कलम प्रतियोगिता’ रही। प्रतियोगिता का उद्देश्य छत्तीसगढ़ी भाषा में मौलिक लेखन को प्रोत्साहित करना, नवोदित रचनाकारों को मंच उपलब्ध कराना तथा युवा पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और साहित्य से जोड़ना था। चयनित दस प्रतिभागियों ने अपनी मौलिक छत्तीसगढ़ी रचनाओं का सशक्त एवं प्रभावपूर्ण पाठ प्रस्तुत किया। प्रतियोगिता के दौरान प्रतिभागियों की भाषा, भाव, प्रस्तुति शैली, मौलिकता तथा मंचीय अभिव्यक्ति का मूल्यांकन किया गया।
प्रतियोगिता का मूल्यांकन डॉ. पी.सी. लाल यादव, श्री राम कुमार साहू, श्रीमती सोम प्रभा नूर, श्री मनोज बक्शी तथा श्री पोखनलाल जायसवाल की निर्णायक मंडली द्वारा निष्पक्ष रूप से किया गया। निर्णायकों के मूल्यांकन के आधार पर राजीव मधुकर (बेमेतरा) ने प्रथम, गायत्री श्रीवास (सिंघनगढ़) ने द्वितीय तथा दिव्यांशु वर्मा (उघरा, बेमेतरा) ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले राजीव मधुकर को ‘नवा कलम सम्मान–2026’ से सम्मानित किया गया। द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त प्रतिभागियों को पुरस्कार एवं सम्मान प्रदान किए गए, जबकि सभी चयनित प्रतिभागियों को सहभागिता सम्मान-पत्र देकर उनकी साहित्यिक प्रतिभा का सम्मान किया गया।
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द्वितीय सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बेमेतरा विधायक श्री दीपेश साहू उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में श्री विजय सिन्हा, डॉ. वीणा त्रिपाठी तथा श्री नारद साहू शामिल रहे। आरूग चौरा के संस्थापक श्री ईश्वर साहू 'आरूग' ने स्वागत उद्बोधन एवं अतिथि परिचय प्रस्तुत किया तथा संस्था की अध्यक्ष श्रीमती पुष्पलता ईश्वर साहू की गरिमामयी उपस्थिति में कार्यक्रम आगे बढ़ा।
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ी साहित्य की तीन महत्वपूर्ण कृतियों—‘ठोमहा भर मोती’ (ईश्वर साहू 'आरूग'), ‘पंचतंत्र के मणि’ (मनोज पाटिल 'मणि') तथा ‘गीत बँधी’ (ईश्वर साहू 'बँधी')—का लोकार्पण अतिथियों के करकमलों से सम्पन्न हुआ। पुस्तक परिचय एवं समीक्षा के दौरान वक्ताओं ने इन पुस्तकों को छत्तीसगढ़ी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए लेखकों की दीर्घ साहित्य साधना की मुक्तकंठ से सराहना की। वक्ताओं ने कहा कि पुस्तकें केवल शब्दों का संग्रह नहीं होतीं, बल्कि समाज की चेतना, संस्कृति और अनुभवों का जीवंत दस्तावेज होती हैं।
कार्यक्रम में ‘छत्तीसगढ़ के थाथी सम्मान’ से श्री मंगत रविन्द्र को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर समाज, संस्कृति एवं लोक परंपराओं के संरक्षण में उनके उल्लेखनीय योगदान की प्रशंसा की गई। साथ ही प्रतियोगिता के विजेताओं, चयनित प्रतिभागियों एवं निर्णायक मंडल का भी सम्मान किया गया।
मुख्य अतिथि श्री दीपेश साहू ने अपने उद्बोधन में कहा कि मातृभाषा के संरक्षण और साहित्य के विकास के लिए ऐसे आयोजनों की आज अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने आरूग चौरा द्वारा किए जा रहे साहित्यिक प्रयासों की सराहना करते हुए इसे नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बताया और कहा कि "ऐसे आयोजनों को वृहद स्तर पर करना चाहिए और पाँच सितारा होटलों में व्यवस्थित करना चाहिए । आगे जब भी ऐसा कार्यक्रम होगा मैं तन मन और धन से पूर्ण सहयोग करूँगा । " डॉ. वीणा त्रिपाठी, श्री विजय सिन्हा तथा श्री नारद साहू ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन पर बल दिया तथा युवा रचनाकारों का उत्साहवर्धन किया और कहा कि ऐसा आयोजन बेमेतरा के इतिहास में पहली बार हो रहा है और इसके लिए आरुग चौरा को साधुवाद दिए ।
तृतीय सत्र में आयोजित काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता जनाब मीर अली मीर ने की। मुख्य पहुना के रूप में श्री संजय शर्मा कबीर ,श्री रामानंद त्रिपाठी, श्री मोहित राम वर्मा तथा वार्ड क्रमांक 14 के पार्षद श्री तोकेश्वर साहू की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर प्रदेश के विभिन्न अंचलों से आए कवियों एवं साहित्यकारों ने छत्तीसगढ़ी भाषा में अपनी उत्कृष्ट रचनाओं का भावपूर्ण पाठ किया। लोकसंस्कृति, मातृभूमि, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाओं, प्रकृति एवं राष्ट्रीय चेतना पर आधारित रचनाओं ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया तथा लंबे समय तक सभागार तालियों से गूंजता रहा।
कार्यक्रम में प्रदेश के विभिन्न अंचलों से आए साहित्यकारों, कवियों, रचनाकारों एवं साहित्यप्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। उपस्थित साहित्यकारों एवं गणमान्यजनों में कवि कृष्णा भारती, शरद यादव, पंकज शर्मा, हेमशंकर पाटिल, जलेश्वर मानिकपुरी, मनीराम साहू 'मितान', मनोज श्रीवास्तव, मनीष वर्मा, मोहन कबीरपंथी, तोम प्रकाश कश्यप, जगदीश सोनी, दिलीप टिकरिया, सुरेंद्र सरल, तारकेश्वर साहू, विकास कश्यप, लीलेश्वर देवांगन, नरेंद्र वर्मा, घनश्याम कुर्रे, आशुतोष साहू, श्रवण कुमार साहू, गोकुल दास बंजारे, विजय चतुर्वेदी, लीलाधर सिंह, राधा यादव, अमित चतुर्वेदी, जगन्नाथ साहू, लक्ष्मण पटेल, खोवालाल बिसेन, लोकनाथ यादव, खीलेंद्र मीरे, दानेश्वर, साधुराम अनंत, सुरेश कुमार रावत, डॉ. डोशन साहू तथा डॉ. बी.आर. साहू सहित अनेक साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। उनकी गरिमामयी उपस्थिति ने पूरे आयोजन को साहित्यिक ऊँचाई एवं व्यापकता प्रदान की।
द्वितीय सत्र के अंत में मनीराम साहू 'मितान' ने आभार प्रदर्शन करते हुए सभी अतिथियों, निर्णायकों, साहित्यकारों, प्रतिभागियों, सहयोगियों एवं उपस्थित जनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। वहीं तृतीय एवं अंतिम सत्र के समापन अवसर पर आरूग चौरा के संस्थापक श्री ईश्वर साहू 'आरूग' ने सभी साहित्यकारों, कवियों, अतिथियों, सहयोगियों एवं साहित्यप्रेमियों का आभार व्यक्त करते हुए मातृभाषा छत्तीसगढ़ी के संरक्षण और साहित्यिक गतिविधियों को निरंतर आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया।
‘बछर तिहार–2026’ ने यह सिद्ध किया कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना, लोकपरंपराओं और मानवीय मूल्यों का सशक्त आधार है। आरूग चौरा द्वारा आयोजित यह आयोजन न केवल नवोदित प्रतिभाओं के लिए प्रेरणा बना, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में भी याद किया जाएगा।योजित यह आयोजन न केवल नवोदित प्रतिभाओं के लिए प्रेरणा बना, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में भी याद किया जाएगा।

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