बैकुंठपुर : सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की अनदेखी करना ग्राम पंचायत सचिव को महंगा पड़ गया। छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग ने ग्राम पंचायत करजी के तत्कालीन जन सूचना अधिकारी एवं सचिव जयप्रताप सिंह पर सूचना देने में लापरवाही और आयोग के नोटिसों की अवहेलना करने पर ₹25,000 का अधिकतम अर्थदंड लगाया है। साथ ही उनके विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भी की गई है।
मामला आरटीआई कार्यकर्ता प्रिंसु पाण्डेय द्वारा वर्ष 2022 में ग्राम पंचायत करजी में 15वें वित्त आयोग (XVFC) से प्राप्त राशि, स्वीकृत कार्यों, भुगतान, मस्टर रोल, वर्क ऑर्डर सहित विभिन्न अभिलेखों की जानकारी मांगने से जुड़ा है। निर्धारित समय सीमा में जानकारी नहीं मिलने पर प्रथम एवं द्वितीय अपील दायर की गई।
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम अपीलीय अधिकारी के निर्देशों के बाद भी आवेदक को सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। कई अवसर दिए जाने और कारण बताओ नोटिस जारी होने के बावजूद जन सूचना अधिकारी ने आयोग के समक्ष संतोषजनक जवाब प्रस्तुत नहीं किया, जिससे आरटीआई अधिनियम की धारा 7(1) का उल्लंघन सिद्ध हुआ।
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आयोग ने आदेश दिया है कि जन सूचना अधिकारी से ₹25,000 का अर्थदंड नियमानुसार वसूलकर शासकीय कोष में जमा कराया जाए। साथ ही संबंधित मुख्य कार्यपालन अधिकारी को निर्देशित किया गया है कि विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित करते हुए आयोग को पालन प्रतिवेदन भेजें। इसके अतिरिक्त आवेदक को मांगी गई समस्त जानकारी आयोग के आदेश प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर निःशुल्क उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए हैं।
यह आदेश सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन और सूचना देने में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राज्य सूचना आयोग के आदेश का आवेदक ने किया स्वागत, कहा– आदेश का पालन नहीं हुआ तो हाईकोर्ट में दायर करेंगे जनहित याचिका
सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी के मामले में छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग द्वारा दिए गए आदेश का आवेदक प्रिंसु पाण्डेय ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए उम्मीद जताई कि आयोग के निर्देशानुसार निर्धारित समय-सीमा के भीतर उन्हें मांगी गई समस्त जानकारी निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी।
प्रिंसु पाण्डेय ने कहा, "मैं छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग के आदेश का स्वागत करता हूँ। यह फैसला स्पष्ट करता है कि सूचना का अधिकार अधिनियम की अनदेखी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। मुझे उम्मीद है कि आयोग के निर्देशानुसार निर्धारित समय-सीमा के भीतर मुझे मांगी गई समस्त जानकारी निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी।"
उन्होंने आगे कहा, "यदि आयोग के आदेश के बावजूद जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है या आदेश का पूर्ण पालन नहीं किया जाता, तो मैं पुनः राज्य सूचना आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करूंगा। साथ ही आयोग के आदेश की अवहेलना और जनहित के इस गंभीर विषय को लेकर आवश्यक होने पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में जनहित याचिका (PIL) भी दायर करूंगा। मेरा उद्देश्य केवल सूचना प्राप्त करना नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना है।"
आवेदक का कहना है कि सूचना का अधिकार केवल सूचना प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन में पारदर्शिता स्थापित करने और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने का सशक्त कानून है। उन्होंने संबंधित विभाग से आयोग के आदेश का अक्षरशः पालन करते हुए समय-सीमा के भीतर समस्त जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की है।
अब इस मामले में सभी की निगाहें संबंधित विभाग पर टिकी हैं कि आयोग के आदेश का पालन किस प्रकार और कितनी शीघ्रता से किया जाता है। यदि निर्धारित अवधि में जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो मामला एक बार फिर राज्य सूचना आयोग के समक्ष पहुंच सकता है तथा आवश्यक होने पर न्यायिक स्तर पर भी चुनौती दी जा सकती है।

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