15 साल बाद भी पत्रकार हत्याकांड अनसुलझा: भाई को मिली जान से मारने की धमकी, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

15 साल बाद भी पत्रकार हत्याकांड अनसुलझा: भाई को मिली जान से मारने की धमकी, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

परमेश्वर राजपूत गरियाबंद/छुरा : लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जाने वाले पत्रकारों की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा नगर में वर्ष 2011 में हुई पत्रकार उमेश राजपूत की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या के लगभग 15 वर्ष बीत जाने के बावजूद मामले का अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आ सका है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस और देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई द्वारा लंबे समय तक जांच किए जाने के बावजूद किसी भी आरोपी को सजा नहीं मिल सकी और न्यायालय में मामले की सुनवाई भी बंद हो गई।परिजनों के अनुसार पत्रकार उमेश राजपूत की उनके निवास पर कई लोगों की मौजूदगी में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना ने उस समय पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी थी और निष्पक्ष जांच की मांग जोर-शोर से उठी थी। बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई, लेकिन पंद्रह वर्ष बीत जाने के बाद भी परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।

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पीड़ित परिवार का कहना है कि इसी बीच पत्रकार के छोटे भाई को घर पर एक पत्र के माध्यम से जान से मारने की धमकी भी दी गई। इस मामले में थाना छुरा में शिकायत दर्ज कराई गई, जहां पुलिस ने जांच का आश्वासन दिया। परिवार का आरोप है कि अब तक धमकी देने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों की पहचान नहीं हो सकी। वहीं अब उन्हें न्यायालय से प्रकरण के खात्मा के संबंध में नोटिस प्राप्त हुआ है, जिससे परिवार में चिंता और बढ़ गई है।इन घटनाओं ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि किसी पत्रकार की हत्या जैसे गंभीर मामले में वर्षों तक जांच के बाद भी दोषियों तक नहीं पहुंचा जा सके और पीड़ित परिवार को लगातार असुरक्षा का सामना करना पड़े, तो यह न्याय व्यवस्था और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर चिंताएं पैदा करता है। अक्सर कहा जाता है कि "कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं", लेकिन ऐसे मामलों में आमजन के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जांच एजेंसियां अपराधियों तक पहुंचने में क्यों असफल रह जाती हैं।

पीड़ित परिवार का कहना है कि जब पुलिस, जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया से भी उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली, तब उनके सामने अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न हो गई है। उनका सवाल है कि यदि किसी नागरिक, विशेषकर पत्रकार, को न्याय और सुरक्षा दोनों नहीं मिलें, तो वह अपनी रक्षा के लिए किस व्यवस्था पर भरोसा करे।यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। ऐसे मामलों में यह आवश्यक है कि सक्षम जांच एजेंसियां उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष और प्रभावी जांच सुनिश्चित करें तथा पीड़ित परिवार को कानून के दायरे में उचित सुरक्षा और न्याय उपलब्ध कराया जाए, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास मजबूत बना रहे।







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