मुखिया के मुखारी – जनमत से ऊपर हाईकमान का मत…

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पंजाब में कैप्टन नहीं रहे कैप्टन जो खिलाड़ी कभी नहीं रहा कैप्टन उसने कैप्टन को बल्लेबाज होने के बावजूद ऐसे गेंद फेंकी की सियासत के माहिर कैप्टन की राजनीतिक पारी का कांग्रेस में अंत हो गया। सिक्सर सिद्धू ने सीमा रेखा के बाहर कर दिया कैप्टन की सारी राजनीतिक उपलब्धियों को पंजाब की राजनीति में कांग्रेस सिद्धू कैप्टन की तनातनी की खबरें काफी अरसे से उड़ रही थी । न दोस्ती काम आयी न पारिवारिक संबंध कैप्टन के लिए कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बेगाना हो गया, कैप्टन को ये अपमान लगा उन्होंने इस्तीफा दे दिया उनके इस्तीफे ने सिद्धू की अहमियत और पार्टी में उनके बढ़ते वर्चस्व की बानगी पेश कर दी।

सिद्धू की कभी भी अपने कप्तानों से नहीं पटी वो चाहे उनके क्रिकेट कप्तान रहे हो या पूर्ववर्ती या वर्तमान राजनीतिक कप्तान । तनातनी में ही वो क्रिकेट टीम का विदेशी दौरा छोड़ आए थे और भाजपा भी अब कांग्रेस में उनकी नई पारी में वों मध्यम क्रम से सलामी बल्लेबाज वाली अपनी नई भूमिका देख रहे ।
पंजाब की राजनीति में कप्तान बनने की कोशिश कर रहे हैं । राजनीति अपनी दशा – दिशा बदल रही है ,पर ये कांग्रेस के लिए कितनी कारगर होगी ? केंद्रीय नेतृत्व क्षेत्रीय क्षत्रपो के संघर्ष के झंझावातो को अपनी कमजोर होती राजनीतिक पकड़ में कैसे साधेगी  । वैसे ये राजनीतिक घटनाक्रम तो है पंजाब का पर छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस का ही सरकार है ।

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने इन्हीं अंतर्कलहो में अपनी सत्ता गवा दी । राजस्थान में भी लगभग यही कहानी चल रही है । छत्तीसगढ़ में भी शक्ति प्रदर्शन हो रहे हैं । कांग्रेस की सत्ता कुछ राज्यों में सिमट कर रह गई है, पर लड़ाई है अंदरूनी जो ना सिमट रही है ना सुलझ रही है । अनिर्णय और संशय ने क्षेत्रीय क्षत्रपो की लड़ाई को बढ़ावा ही दिया है, न केंद्रीय नेतृत्व ये तय कर पा रहा है कि उन्हें किसे दुलारना है और किसे डपटना है न ये निर्णय हो पा रहा है कि जो मुखिया अपने बेटे को लोकसभा का चुनाव नहीं जीता पाए वो प्रदेश में पार्टी को अगला विधानसभा चुनाव कैसे जीता ले जायेंगे ।

कांग्रेस अपने पुराने और नए युवा नेताओं के बीच समन्वय स्थापित नहीं कर पा रही है । यही समन्वय का अभाव क्षेत्रीय क्षत्रपो को स्वेच्छाचारी बना रहा है । इस स्वेच्छाचारिता में सब सब्र टूट रहा है, पार्टी टूट रही है, पर अनिर्णय की स्थिति में कुछ बदल ही नहीं रहा । ऐसी राजनीतिक परिस्थिति में छत्तीसगढ़ के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी संशय है की यहां की राजनीति किस करवट बैठेगी । पंजाब में तो राजा को राजनीतिक मात मिली मध्य प्रदेश में महाराजा ने नई राजनीतिक ईबारत लिख दी । राजस्थान में पायलट रोज उड़ान भरने की तैयारी में है ।

छत्तीसगढ़ के राजा का क्या होगा ? प्रदेश की सरकार राजनीतिक रस्साकशी में उलझी है महीनों से आरोप-प्रत्यारोप हो रहे, सदन से लेकर सड़क तक अपने ही अपनों के खिलाफ राजनीतिक बयानबाजी कर रहे हैं,अदावत इतनी बढ़ गई है कि सत्ता के शिखर तक पहुंचने और बने रहने की जद्दोजहद में एकजुटता टूट गई । एक मत से मिली बहुमत में दोमत का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि राज्य में भी सत्ता संघर्ष सबको दिख रहा है। राजनीतिज्ञ अपने ही महत्वाकांक्षाओं में जन आकांक्षाओं को भूल रहे । ऐतिहासिक बहुमत की सरकार अपनी ही अंतर्विरोधो में घिर रही है । सकारात्मक सब कुछ था ,पर इन पर बस ये आपसी टूट भारी पड़ रही है ।

सब सत्ता को है लालायित जिधर सत्ता है उधर कारवां चल रहा है । दलबदल, आस्था बदल सब मंजूर हो रहा बस सत्ता बदल को मंजूरी कहीं मिल तो कही नही मिल रही राजनीतिक शक्तियों में अब इतना अंतर आ गया है की बिना किसी बड़े असंतोष के पूरी राज्य की सरकार बदल दी जा रही और दूसरी तरफ अनिर्णय की स्थिति है । मजबूत इच्छाशक्ति के बिना निर्णय कैसे होगा ? और जब निर्णय ही नहीं होगा तो अंतर्विरोधो से घिरी सरकारों की उम्र कितनी लंबी ? राजनीति में सत्ता ही सब कुछ होती जा रही है। जनता के मतों के ऊपर हाईकमान के मत है मतलब – अब जनमत से ऊपर हाईकमान का मत…

चोखेलाल
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मुखिया के मुखारी में व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल

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